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काली धार (Kali Dhaar) Novel in Hindi

काली धार (Kali Dhaar) Novel in Hindi

Regular price ₹ 425.00
Regular price ₹ 550.00 Sale price ₹ 425.00
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Format : Hardcover

Writer : Mahesh Katare

Pages : 270

ISBN : 9788193759875

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जमादारिन की हवेली बीसियों साल से बंद थी। साल में एकाध बार उनका बेटा आगरा से आता। विशेषतः दीपावली से पहले आकर वह दो-चार दिन ठहरता। कलई-चूने से मंदिर की पुताई-सफाई करवाता और लौट जाता। अयारी आकर वह सेठ की हवेली में ही ठहरता। सेठ के लड़के, पोते उससे छुआछूत वाला व्यवहार नहीं करते थे। अगली पीढ़ी को हवेली की आवश्यकता न थी। इस बीहड़ में कौन बसता? तालों की चाबियाँ सेठ परिवार के पास थीं। हवेली में एक छोटा सा द्वार पीछे बीहड़ों की ओर भी खुलता था, जिसमें से होकर बागियों के गिरोह हफ्तों हवेली में पड़े रहते और चौमासे अर्थात् बरसात में तो महीनों। सबको पता था। पुलिस की गश्त भी यदा-कदा सामने के द्वार पर जड़े ताले को देखती हुई निकल जाती थी। गिनती का पुलिस-दल डाकुओं से टकराने का खतरा कैसे उठाए? बागी भी सामान्यजन को परेशान नहीं करते थे। उनके निशाने पर तो दुश्मन, धनवान अथवा मुखबिर आता था। रसद लाने वाले को पूरा पैसा चुकाते थे बागी। लाला जी ने सेठ श्रीलाल के वंशजों से संपर्क किया। जमादारिन के पुत्र से अनुमति ली तो ठाकुर ने दाऊ मानसिंह को समस्या का पहलू समझाया। मानसिंह का गिरोह ही उस समय सबसे प्रभावशाली था। वह कड़ाई से बागी-धर्म के नैतिक नियमों का पालन करते थे। कुल मिलाकर आठ दिन में ऊपरी औपचारिकता पूरी हो गई एवं आठ दिन सफाई आदि के जरिये हवेली को बसने योग्य बनाने में लगे। इस तरह अम्मा ठाकुर जमादारिन की हवेली में रहवासी हो गईं। नवाब ठाकुर की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए लाला भभूती लाल ने कुछ विशेष व्यवस्था भी कर दी। -इसी उपन्यास से

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