{"title":"उपन्यास (Novel)","description":"\u003cp\u003eहिंदी साहित्य के उपन्यास \u003cspan\u003eविधा\u003c\/span\u003e भावनाओं और अनुभवों की एक अद्भुत दुनिया है। हर उपन्यास आपको नए पात्रों, नई सोच और जीवन की गहराइयों से रूबरू कराता है। \u003cspan class=\"hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline\"\u003e\u003cspan class=\"whitespace-normal\"\u003eमुंशी प्रेमचंद\u003c\/span\u003e\u003c\/span\u003e जैसे महान लेखकों की रचनाएँ आज भी दिल को छू जाती हैं। अगर आप पढ़ने के शौकीन हैं, तो ये उपन्यास आपके मन को बाँध लेंगे। अपनी पसंदीदा किताब चुनें और खो जाएँ एक नई दुनिया में।\u003c\/p\u003e","products":[{"product_id":"तुम्हारे-लिए-tumhare-liye-a-novel-in-hindi","title":"तुम्हारे लिए (Tumhare Liye) A Novel in Hindi","description":"\u003cp class=\"cvGsUA direction-ltr align-center para-style-body\"\u003e\u003cspan class=\"a_GcMg font-feature-liga-off font-feature-clig-off font-feature-calt-off text-decoration-none text-strikethrough-none\"\u003eनैनीताल की धुंध, झील की खामोशी और पहाड़ों में दबा एक अनकहा प्रेम—\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp class=\"cvGsUA direction-ltr align-center para-style-body\"\u003e\u003cspan class=\"a_GcMg font-feature-liga-off font-feature-clig-off font-feature-calt-off text-decoration-none text-strikethrough-none\"\u003e“तुम्हारे लिए”\u003c\/span\u003e\u003cspan class=\"a_GcMg font-feature-liga-off font-feature-clig-off font-feature-calt-off text-decoration-none text-strikethrough-none\"\u003e प्रेम के मिलने की नहीं, उसे जी न पाने की कहानी है।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp class=\"cvGsUA direction-ltr align-center para-style-body\"\u003e\u003cspan class=\"a_GcMg font-feature-liga-off font-feature-clig-off font-feature-calt-off text-decoration-none text-strikethrough-none\"\u003eगुरु–शिष्या के रिश्ते से शुरू होकर यह कथा ऐसे प्रेम में बदलती है, जो शब्दों में नहीं, त्याग और मौन में जिया जाता है। समय, दूरी और गलत फैसले इस प्रेम को ऐसा अधूरापन देते हैं जो पाठक के भीतर तक उतर जाता है।\u003c\/span\u003e\u003cspan class=\"a_GcMg font-feature-liga-off font-feature-clig-off font-feature-calt-off text-decoration-none text-strikethrough-none white-space-prewrap\"\u003e \u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp class=\"cvGsUA direction-ltr align-center para-style-body\"\u003e\u003cspan class=\"a_GcMg font-feature-liga-off font-feature-clig-off font-feature-calt-off text-decoration-none text-strikethrough-none\"\u003eयह कहानी उम्मीद जगाकर उसे तोड़ती है— और इसी टूटन में अपनी अमरता पाती है। नब्बे के दशक में दूरदर्शन पर धारावाहिक के रूप में प्रसारित यह कृति आज भी उतनी ही जीवित, उतनी ही मार्मिक और उतनी ही प्रासंगिक है। \u003c\/span\u003e\u003cspan class=\"a_GcMg font-feature-liga-off font-feature-clig-off font-feature-calt-off text-decoration-none text-strikethrough-none\"\u003e“तुम्हारे लिए”\u003c\/span\u003e\u003cspan class=\"a_GcMg font-feature-liga-off font-feature-clig-off font-feature-calt-off text-decoration-none text-strikethrough-none\"\u003e आज के युवाओं के लिए भी उतना ही सच्चा सवाल है—क्या हम अपने डर के कारण अपने सबसे कीमती रिश्ते खो रहे हैं?\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"Himanshu Joshi","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48170955505831,"sku":null,"price":300.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/tumhareliye.png?v=1774072561"},{"product_id":"उत्तर-कांड-uttar-kand-novel","title":"उत्तर कांड (Uttar Kand) Novel","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eवाल्मीकि के ‘रामायण’ का अध्ययन करते समय हमें चरित्रों को दृष्टि से, चरित्र-चित्रण की दृष्टि से, घटनाओं की स्वाभाविकता की दृष्टि से, वर्णनों के औचित्य की दृष्टि से और चरित्रों के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की दृष्टि से जो कमियाँ नज़र आती हैं, उन सभी का समाधान उत्तर कांड नामक इस उपन्यास में मिलता है। जैसा कि “पर्व” में किया गया था, “उत्तर कांड’ में भी चरित्रों और घटनाओं को मिथकीकरण से मुक्त करके, स्वाभाविक परिवेश में प्रस्तुत कर दिया गया है। इसलिए इसको आधुनिक गद्य-महाकाव्य होने की प्रतिष्ठा भी मिली है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है कि (कन्नड् में) एक ही साल में इसकी तेरह आवृत्तियाँ और आज तक अट्ठारह आवृत्तियाँ प्रकाशित हुई हैं और इसके हिंदी, अंग्रेज़ी तथा मराठी अनुवाद भी प्रकाशित हो चले हैं।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"एस० एल० भैरप्पा","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48171307172007,"sku":null,"price":500.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/uttar.png?v=1774078751"},{"product_id":"पारिजात-parijat-novel-in-hindi","title":"पारिजात (Parijat) Novel in Hindi","description":"\u003cp\u003e\u003cstrong\u003eसाहित्य अकादमी से पुरस्कृत उपन्यास\u003c\/strong\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cp\u003e\u003cspan\u003e‘पारिजात’ केवल एक वृक्ष, कथा और विश्वास मात्र नहीं है, बल्कि यथार्थ की धरती पर लिखी एक ऐसी तमन्ना है, जो रोहन के ख़ून में रेशा-रेशा बनकर उतरी है और रूही के श्वासों में ख़्वाब बनकर घुल गई है। उपन्यास में ‘पारिजात’ एक रूपक नहीं, वह दरअसल नए-पुराने रिश्तों की दास्तान है। उपन्यास की कथावस्तु में इतिहास कहीं किरदार बनकर उभरता है तो कहीं वर्तमान और अतीत के बीच सूत्रधार की भूमिका निभाता नज़र आता है। उसकी इस आवा-जाही में उपन्यास के पात्र कभी तारीख़ से गुरेज़ाँ नज़र आते हैं तो कभी उसको तलाश करते हुए खुद अपनी खोज में लग जाते हैं। उनकी इस कोशिश में बहुत-से संदर्भ, शख़्सियतें, घटनाएँ चाहे-अनचाहे अपना आकार ग्रहण कर लेती हैं और समय विशेष पर पड़ी धूल को अपनी उपस्थिति से ख़ारिज कर एक नई स्मित की तरफ़ ले जाती हैं, जहाँ पर दुनियावी भाग-दौड़ के बीच रिश्तों की बहाली की जद्दोजहद अपनी सारी ख़ूबसूरती और ऊर्जा के साथ मौजूद है। कहा जा सकता है कि नासिरा शर्मा का यह उपन्यास उनकी अभी तक की सृजनात्मकता का निचोड़ है, जिसमें उनके विचार, बयान, भाषा, संवेदना और सरोकार बहुत संजीदा और धारदार बनकर उभरे हैं। क़िस्सागोई का पुराना फन उन्हें बख़ूबी आता है। अलिफ़-लैला की दास्ताँगो शहरज़ाद की तरह लेखिका इनसानी संवेदनाओं के तहख़ानों, रिश्तों के गलियारों और देशकाल के पेचीदा रास्तों से गुज़ारती हुई पाठक को उन चरित्रों के मन की गहरी थाह लेने में न केवल मददगार साबित होती हैं, बल्कि क़िस्से के अंत तक पहुँचते-पहुँचते यह रचना उनके दिलों में रिश्तों की अहमियत का जज़्बा भी उभारती है। समय के इस दौर में ‘पारिजात’ उपन्यास को पढ़ना एक उपलब्धि ही मानी जाएगी।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"नासिरा शर्मा","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48181961359527,"sku":null,"price":550.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/Partijat.png?v=1774240828"},{"product_id":"दिल्ली-delhi-novel-in-hindi","title":"दिल्ली (Delhi) Novel in Hindi","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eउपन्यास का नाम शहर के नाम से ! जी हाँ, यह दिल्ली की कहानी है। छह सौ साल पहले से लेकर आज तक की । खुशवंत सिंह की अनुभवी कलम ने इतिहास के ढाँचे को अपनी रसिक कल्पना की शिराओं और मांस-मज्जा से भरा। यह शुरू होती है सन् 1265 के ग़यासुद्दीन बलबन के शासनकाल से । तैमूर लंग, नादिरशाह, मीर तक़ी मीर, औरंगज़ेब, अमीर खुसरो, बहादुर शाह ज़फ़र आदि के प्रसंगों के साथ कहानी आधुनिक काल की दिल्ली तक पहुँचती है कैसे हुआ नयी दिल्ली का निर्माण ! और अंत होता है 1984 के दंगों के अवसानमय परिदृश्य में ! कहानी का नायक–मुख्य वाचक है, दिल्ली को तहेदिल से चाहने वाला एक व्यभिचारी किस्म का चरित्र, जिसकी प्रेयसी भागमती कोई रूपगर्विता रईसज़ादी नहीं, वरन् एक कुरूप हिंजड़ा है। दिल्ली और भागमती दोनों से ही । नायक को समान रूप से प्यार है। देश-विदेश के सैर-सपाटों के बाद जिस तरह वह बार-बार अपनी चहेती दिल्ली के पास लौट-लौट आता है, वैसे ही देशी-विदेशी औरतों के साथ खाक छानने के बाद वह फिर-फिर अपनी भागमती के लिए बेकरार हो उठता है। तेल चुपड़े बालों वाली, चेचक के दागों से भरे चेहरे वाली, पान से पीले पड़े दाँतों वाली भागमती के वास्तविक सौंदर्य को उसके साथ बिताए अंतरंग क्षणों में ही देखा-महसूसा जा सकता है। यही बात दिल्ली के साथ भी है। भागमती और दिल्ली दोनों ही ज़ाहिलों के हाथों रौंदी जाती रहीं। भागमती को उसके गँवार ग्राहकों ने रौंदा, दिल्ली को बार-बार उजाड़ा विदेशी लुटेरों और आततायियों के आक्रमणों ने। भागमती की तरह दिल्ली भी बाँझ की बाँझ ही रही ।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"खुशवंत सिंह","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48182278881447,"sku":null,"price":450.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/Delhi_1.png?v=1774247241"},{"product_id":"पहाड़नामा-pahadnama-novel-in-hindi","title":"पहाड़नामा (Pahadnama) Novel in Hindi","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003e‘माटूहमरु, पाणी हमरु, हमरा ही छन भिबौणभि... पितरों ने लगाई बौण, हमुन ही तो बचौणभि... ’ (मिट्टी हमारी, पानी हमारा, हमारे हैं ये जंगल। हमारे पूर्वजों ने इन जंगलों को पोसा, अब हमें ही इनकी रक्षा करनी है) ---अब मुद्दा यही है कि बांध जरूरी है या नहीं? -यह कुदरत की अवहेलना या अनादर है? या मानव के जीवन के विकास की एक प्रक्रिया और आवश्यकता? -क्या हम पहाड़ खत्म करके किसी अनिष्ट को न्योता दे रहे हैं? -डूबे हुए गांवों पर झील बनाकर वहां नाव चलाना क्या हमारी आंखों में आंसू नहीं ले आता? -सालों पुराने पेड़ों का कत्ल कर देना कहां की मानवीयता है? -क्या सच में कुछ लोग बिना अनुदान के रह जाते हैं? -क्या हम इन लोगों पर अत्याचार करते हैं? -क्या बड़े बांध बनाना ही जरूरी है? -रन ऑफ रिवर से परहेज क्यों? सबसे अहम सवाल-क्या विकास सच में हमें तोड़ देता है? -इसी उपन्यास से\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"अनिता सभरवाल","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48188675129511,"sku":null,"price":235.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/pahadnama.png?v=1774323152"},{"product_id":"विलियम-रामायण-ले-गया-william-ramayan-le-gya-novel-in-hindi","title":"विलियम रामायण ले गया (William Ramayan Le Gya) Novel in Hindi","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eरामकथा से कौन परिचित नहीं है। कितु सभी के मन में कुछ प्रश्न उठते रहते होंगे। …यह कि क्या हनुमान बंदर थे? क्या हनुमान हवा में उड़ सकते थे? क्या कोई व्यक्ति पहाड़ उठा सकता है? और यह कि माया क्या होती है? इंद्रजीत लड़ते-लड़ते कैसे गायब हो जाता था? रावण के दस सिर और बीस हाथ कैसे सम्भव हैं? दूसरी ओर, राम ने वह धनुष कैसे उठा जिसे अनेक योद्धा एक साथ मिलकर भी नहीं उठा पाए थे? यह ऐसे प्रश्न हैं जिन्हें सुनकर, पढ़कर लोगों का रामकथा से विश्वास उठ जाता है। लोग रामकथा को कपोल-कल्पना समझने लगते हैं, और रामायण को ‘मिथक’ मानने लगते हैं। प्रस्तुत पुस्तक ‘विलियम रामायण ले गया’ लंदन से अपने भारतीय मित्रें के साथ भारत देखने आए, 14 वर्षीय अंग्रेज बालक के अनुभव की कहानी है। वह एक भारतीय परिवार में ठहरता है और मित्रें के दादाजी, चाचा-चाची और बच्चों से घुल-मिल जाता है। वह टी-वी- देखता है और रामायण का सीरियल देखकर कई प्रश्न करता है…जिसका सविस्तार उत्तर दादी जी के पास है। वह भारतीय पद्धति से मनाया गया बिना केक वाला जन्मदिन भी देखता है। ताज देखने की ललक में मथुरा, वृन्दावन भी घूम आता है और सलीम चिश्ती की दरगाह, फतेहपुर सीकरी, बुलंद दरवाजा आदि भी देखता है, लौटते समय वह अपने साथ रामायण की सी-डी- भी ले जाता है। हमें पूरा विश्वास है कि यह किशोर उपन्यास, बालयन को ही नहीं, वयस्क पाठकों को भी नई दृष्टि प्रदान करेगा।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"सीतेश आलोक","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48188769927335,"sku":null,"price":150.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/william.png?v=1774324509"},{"product_id":"क्या-नाम-दूँ-तुझे-ऐ-ज़िंदगी-kya-naam-doon-tujhe-e-zindagi-novel-in-hindi","title":"क्या नाम दूँ तुझे...ऐ ज़िंदगी (Kya Naam Doon Tujhe e Zindagi) Novel in Hindi","description":"\u003cp\u003eइसी उपन्यास से एक अंश - उर्वशी पूरी तल्लीनता से, एकदम निश्चिंत होकर किसी से फोन पर बात कर रही थी। जाहिर है, रोगिणी के बिस्तर से उठने का उसे अंदेशा न था। तीनों पुरुष सदस्य घर से बाहर थे और माया अपना काम खत्म करके जा चुकी थी। अपने ऐकांतिक साम्राज्य की एकछत्र स्वामिनी बहूरानी पूरी तन्मयता से बतरस में निमग्न थीं। कंठस्वर इतना तेज था कि दरवाजे पर लहराते परदे को चीरता हुआ गलियारे में स्पष्ट सुनाई दे रहा था। शब्द नहीं, जैसे दहकता अंगारा जयलक्ष्मी के कानों में पड़ा, 'सुनती हो माँ, आज बुढ़िया बुखार का ढोंग रचकर बिस्तर पर पड़ी है। कोई बुखार-वुखार नहीं, मुझे रसोईघर में भेजने की साजिश रची थी। पर मैंने भी कच्ची गोलियाँ नहीं खेली हैं। ऐसा दाँव चला कि बुढ़िया चित हो गई।' उधर से क्या कहा गया, यह तो पता नहीं, कितु उर्वशी का अट्टहास बाहर तक सुनाई दिया, 'बिलकुल ठीक कहा, माँ। तभी तो मैंने तुम्हारे दामाद को भेजकर हलवाई के यहाँ से पूरी-सब्जी मँगवा ली थी।---रसोईघर में घुसती है मेरी जूती!' क्षणिक अंतराल के बाद पुनः उर्वशी की आवाज सुनाई दी, 'तू फिक्र न कर माँ, तेरी बेटी बहुत समझदार है। सास-ससुर के साथ कैसा सलूक करना चाहिए, अच्छी तरह जानती है।' जयलक्ष्मी के भीतर इससे ज्यादा सुनने की ताब न थी। कितु पाँवों को घसीटकर आगे ठेलने की ताकत भी तो चुक गई थी। विवश भाव से वह सुने जा रही थी, 'ओह माँ, तू चिता क्यों करती है? तेरी नसीहत का हर्फ-हर्फ मैंने कलेजे में उतारा है। तुम्हारा दामाद मेरे इशारे पर उठने-बैठने वाला भेड़ा बन चुका है। इसके बाद मुझे किसी और हथियार की दरकार है ही नहीं। उसे इस्तेमाल करके बहुत जल्दी अपनी योजना पर अमल करूँगी। जीत हासिल न कर सकी, तो तेरी बेटी क्या रही!'\u003c\/p\u003e","brand":"उषा यादव","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48188821668007,"sku":null,"price":315.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/kyanaam.png?v=1774325209"},{"product_id":"तट-के-बंधन-tat-ke-bandhan-novel-in-hindi","title":"तट के बंधन (Tat Ke Bandhan) Novel in Hindi","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eनीलम\u003c\/span\u003e बोली, \"जीजी, नारी क्या विवाह के बिना कुछ नहीं है ?\" \"नारी विवाह के बिना भी नारी है। सरला पर जो कुछ बीती है, उसका कारण मात्र विवाह नहीं है, डर भी है। कहूँगी, वही है।\" नीलम ने कुछ जवाब नहीं दिया। उसे लगा, जैसे यही डर उस के भीतर भी कुंडली मारे बैठा है। शशि फिर बोली, \"स्त्री शक्ति और शाप दोनों है। विवाह इन दोनों अतियों के बीच का मार्ग ढूँढ़ने का एक साधन है । युग-युग से इस क्षेत्र में प्रयोग हुए हैं, पर स्त्रीत्व को कोई नहीं मिटा सका, क्योंकि स्त्रीत्व के बिना मातृत्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। जब तक स्त्रीत्व है, विवाह है। \"नीलम ने इस बार भी कुछ जवाब नहीं दिया।शशि ने ही फिर कहा, \"स्त्रीत्व का सही प्रयोग नारी का अधिकार है और अधिकार का प्रयोग सबसे बड़ा कर्तव्य है।\" नीलम उसी तरह मौन रही। शशि तब तड़पकर बोली, \"बोलती क्यों नहीं ?\" नीलम ने कोई जवाब देने की चेष्टा नहीं की। उसकी आँखों से आँसू गिरते रहे। उन्हें भी उसने नहीं पोंछा। पर दो क्षण बाद शशि फिर बोली, \"मुझे ये आँसू अच्छे नहीं लगते नीलम ! यही शक्ति लेकर क्या कुछ करने की चाह रखती है ? मंत्र तो मात्र आवरण है। जड़ में तो स्त्री का स्त्रीत्व और पुरुष का पुरुषत्व कसौटी पर है। हमें उस पर नहीं, मंत्रों की शक्ति पर प्रहार करना है, जो पुराने पड़ गए हैं।स्वतंत्र भारत में इतना भी नहीं कर पाई तो उस स्वतंत्रता का क्या लाभ ? \"नीलम में न जाने कहाँ से साहस आ गया। बोली, \"जीजी, स्वतंत्रता की नींव में नारी का नारीत्व अभिशाप बनकर पड़ा हुआ है। उस प रक्या बीती, इसका क्या कोई सही-सही लेखा-जोखा रख पाया है ?\" -इसी पुस्तक से\u003c\/p\u003e","brand":"विष्णु प्रभाकर","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48196807950503,"sku":null,"price":175.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/tat.png?v=1774423540"},{"product_id":"दोहरा-अभिशाप-dohra-abhishaap-novel-in-hindi","title":"दोहरा अभिशाप (Dohra Abhishaap) Autobiographical Novel in Hindi","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eदलित साहित्य के आम उपन्यासों की तरह बैसंत्री का यह उपन्यास भी आत्मकथात्मक है; लेकिन कई अन्य बातों में यह आम दलित साहित्य के उपन्यासों से भिन्न है । यह उपन्यास लेखिका के लंबे, संघर्षपूर्ण, कड़वे-मीठे अनुभवों से भरे जीवन के एक सिंहावलोकन के रूप में लिखा गया है अत: यह आत्मरति या आत्मपीड़न से उत्प्न्न उन स्तब्धकारी प्रभावों से मुक्त है जो आम तौर पर दलित साहित्य की रचनाओं में पाए जाते हैं । इसमें ऐसे प्रसंग नहीं है कि पाठक क्रोध, घृणा और जुगुप्सा के भावों से भर जाए या दाँतों तले अंगुली दबाकर रह जाए । यह एक सीधी-सादी जीवन-कथा है जो हर प्रकार के साहित्यिक छलों से मुक्त है । घोर-से-घोर परिस्थितियों में भी आदमी अपने लिए एक सुरक्षित नीड़ का निर्माण कर लेता है । इस नीड़ का निर्माण वे प्रेम से कस्ते हैं-बच्चों का प्रेम, माता-पिता का प्रेम, मित्रों और परिवारजनों का प्रेम, अनजान व्यक्तियों का प्रेम और कुल मिलाकर जिंदगी से प्रेम । इस प्रेम के बिना कोई जी नहीं सकता । यह जिंदगी का कारण भी है और उसकी सार्थकता भी । इसलिए यह कहना कि दलितों के जीवन में और होता ही क्या है, इकतरफा और जल्दबाजी का वक्तव्य है ।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"कौसल्या बैसंत्री","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48242598772903,"sku":null,"price":225.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/dohrapb_1.png?v=1774684854"},{"product_id":"जी-मेल-एक्सप्रेस-g-male-express-novel-in-hindi","title":"जी-मेल एक्सप्रेस (G-Male Express) Novel in Hindi","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eबदलते समय के साथ वैचारिक मुठभेड़ करता हुआ यह उपन्यास, पाठकों को एक ऐसी दुनिया से रूबरू कराता है जो उसे चौंकाती है कि ये पात्र, ये परिवेश उसके लिए अपरिचित तो नहीं थे मगर वे उसे उस तरह से पहचान क्यों नहीं पाए? देवेन त्रिपाठी को मिली डायरी की तरह ही हमारी जिंदगी की किताब भी अनेक प्रकार के कोड्स से भरी है जिसे हम अपनी-अपनी तरह से डिकोड करते हैं। एक ही दुनिया हर किसी को अलग-अलग तरह से दिखाई पड़ती है। इसीलिए उसे जानने और समझने का सिलसिला कभी खत्म नहीं होता। स्कूल-कॉलेज की जिंदगी के बीच पनपते अबोध प्रेम की मासूमियत को चित्रित करता यह उपन्यास जब उसमें हो रही सौदेबाजी का चित्रण करता है तब सारा तिलिस्म टूट जाता है और उस परदानशीन जिंदगी की तस्वीरें साफ होने लगती हैं जिन्हें देखने के लिए माइक्रोस्कोपिक निगाह की दरकार होती है। आज ऐसे लोगों की तादाद बढ़ी है जो जीवन का भरपूर आनंद उठाने के क्रम में भटकाव का शिकार हो ‘शॉर्ट लिव्ड मल्टीपल रिलेशनशिप्स’ की ओर जाने लगे हैं। ऐसे संबंध सतही तौर पर भले ही उन्हें संतुष्ट कर दें मगर अहसास के स्तर पर उनके पास सिवाय अकेलेपन के और कुछ नहीं बचता! सवाल यह है कि अगर दैहिक सुख के बिना प्रेम अधूरा है तो क्या यौन सुख पा लेने से ही प्रेम की प्राप्ति हो जाती है? क्या स्त्री के लिए इस सुख की कामना करना अपराध है? सवाल यह भी है कि महज गर्भ धारण न करने से ही स्त्री की यौन-शुचिता प्रमाणित हो जाती है तो पुरुष की शुचिता कैसे प्रमाणित की जाए? पैसों की खातिर यौन सुख देने वाली स्त्रियां अगर वेश्याएं हैं तो स्त्रियों को काम-संतुष्टि बेचने वाले पुरुषों को कौन सी संज्ञा दी जाए? यह उपन्यास महिलाओं की काम-भावना की स्वीकृति का प्रश्न तो उठाता ही है, स्त्री-पुरुष की यौन-शुचिता को बराबरी पर विश्लेषित करने की मांग करते हुए मेल प्रॉस्टीट्यूशन से जुड़े पहलुओं पर भी शोधपरक चिंतन प्रस्तुत करता है। यह निम्नतम से उच्चतम की एक ऐसी यात्रा है जो व्यक्ति को सही मायने में चैतन्य करती है और चैतन्य होना ही ‘बुद्धत्व’ अथवा ‘महामानव’ की ओर बढ़ने का वास्तविक प्रयाण है। यही कारण है कि उपन्यास अपने चरम तक पहुंचकर भी ठहरता नहीं बल्कि बदलते सरोकारों पर नए सिरे से सोचने का आह्नान करता है कि इसे फिर से पढ़ो, फिर से गढ़ो।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"अलका सिन्हा","offers":[{"title":"Default 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बिलख-चीख और आर्तनाद को उन्होंने परखा तथा गहरे पैठकर यह जाना कि जाति, वंश और धर्म आदि के नाम पर एक बड़े वर्ग को मनुष्य की श्रेणी से ही अपदस्थ किया जा रहा है। इस षड्यन्त्र के अन्तर्गत पनप रही तथाकथित सामाजिक ‘आम सहमति’ पर उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से रचनात्मक हस्तक्षेप किया, जिसके चलते वह लाखों-करोड़ों पाठकों के चहेते शब्दकार बने। नारी और अन्य शोषित समाजों के धूसर जीवन का उन्होंने चित्राण ही नहीं किया, बल्कि उनके आम जीवन में आच्छादित इन्द्रधनुषी रंगों की छटा भी बिखेरी। प्रेम को आध्यात्मिकता तक ले जाने में शरत् का विरल योगदान है। शरत्-साहित्य आम आदमी के जीवन को जीवंत करने में सहायक जड़ी-बूटी सिद्ध हुआ है। हिन्दी के एक विनम्र प्रकाशक होने के नाते हमारा यह उत्तरदायित्व बनता ही था कि शरत्-साहित्य को उसके मूलतम ‘पाठ’ के अन्तर्गत अलंकृत करके पाठकों को सौंप सकें, अतः अब यह प्रस्तुति आपके हाथों में है। हमारा प्रयास रहेगा कि किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और प्रकाश्य शरत्-साहित्य को सर्वांग तथा सर्वश्रेष्ठ होने का प्रमाणपत्र आप जैसे सुधी पाठकों द्वारा ही जारी किया 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की गश्त भी यदा-कदा सामने के द्वार पर जड़े ताले को देखती हुई निकल जाती थी। गिनती का पुलिस-दल डाकुओं से टकराने का खतरा कैसे उठाए? बागी भी सामान्यजन को परेशान नहीं करते थे। उनके निशाने पर तो दुश्मन, धनवान अथवा मुखबिर आता था। रसद लाने वाले को पूरा पैसा चुकाते थे बागी। लाला जी ने सेठ श्रीलाल के वंशजों से संपर्क किया। जमादारिन के पुत्र से अनुमति ली तो ठाकुर ने दाऊ मानसिंह को समस्या का पहलू समझाया। मानसिंह का गिरोह ही उस समय सबसे प्रभावशाली था। वह कड़ाई से बागी-धर्म के नैतिक नियमों का पालन करते थे। कुल मिलाकर आठ दिन में ऊपरी औपचारिकता पूरी हो गई एवं आठ दिन सफाई आदि के जरिये हवेली को बसने योग्य बनाने में लगे। इस तरह अम्मा ठाकुर जमादारिन की हवेली में रहवासी हो गईं। नवाब ठाकुर की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए लाला भभूती लाल ने कुछ विशेष व्यवस्था भी कर दी। -इसी उपन्यास से\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"महेश कटारे","offers":[{"title":"Default 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उसी के पालन में यहाँ तक भी चली आई, क्यांेकि मामा हमारे संरक्षक रहे हैं, पालनहार। कृतज्ञता से मँुह मोड़ना हमें अपराध ही नहीं, पाप लगता है। तुम्हारी तरह मुँह में आया सो बक दिया, यह हमने सीखा नहीं, क्योंकि इसे हमारे यहाँ बेहूदापन कहते हैं। -इसी पुस्तक से\u003c\/span\u003e\u003c\/div\u003e","brand":"मैत्रेयी पुष्पा","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48272684318887,"sku":null,"price":215.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/triya.png?v=1774759545"},{"product_id":"गयी-झुलनी-टूट-gayi-jhulani-toot-nove-in-hindi","title":"गयी झुलनी टूट (Gayi Jhulani Toot) Nove in Hindi","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eउषाकिरण खान का यह नया उपन्यास गई झुलनी टूट उनकी प्रसिद्धि को एक कदम आगे लेकर जाता है। इसमें उन्होंने एक सीधा-सादा मगर मार्मिक सवाल उठाया है, ‘…जीवन केवल संग-साथ नहीं है। संग-साथ है तो वंचना क्यों है?’ इस रचना में उन्होंने सामान्य भारतीय परिवेश में एक स्त्री की जीवन-दशा का मार्मिक चित्रण किया है। 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Hindi","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003e विख्यात उपन्यासकार भैरप्पा ने प्रस्तुत उपन्यास में वंशावली के आदि और जटिल प्रश्नों पर आधारित जिस गहन एवं मर्मस्पर्शी कथा का ताना-बाना बुना है, वह भारतीय मनीषा की प्रश्नाकुलता की ऊर्जा है और हमारी वंशीय परंपरा का राग-अनुराग एवं विराग भी। जीवन के लिए निर्धारित लक्ष्यों को अर्जित कर लेना, अपने ‘वंश’ को आगे बढ़ाने का स्वस्थ संकेत है, अथवा संतति के माध्यम से ही वंशीय परंपरा का वहन सहज संभव हो सकता है—अपने उपलक्ष्य में यह कृति इन प्रश्नों से जूझती है। वंशजों के रक्त-संबंधों की शुचिता की आशंकाएं तथा सरोकार भी इस कथा में जहां-तहां तैरते हुए नए भावबोध और अवधारणाओं से हमारा सामना कराते हैं। एक अंचल विशेष का वर्णन होते हुए भी यह कृति अखिल भारतीय या कहें कि वैश्विक मनोजगत् की प्रतिनिधि रचना है जो जीवन के संबंधों, संयोगों और सहभावों से संरचित है। जीवनगत निर्णयों के उद्दाम स्रोतों से प्रस्फुटित कई जीवनलीलाओं के तटों को निर्धारित और ध्वस्त करती इस कथा में लेखक के द्वंद्वों को स्वर देने का काम उसके नायक करते हैं तथा मानो यह सब घटित होते हैं पाठक के 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इस गाथा को ऊंचाई, ऊष्मा तथा गरिमा प्रदान करती है। 'मीठी नीम' की कहानी में दर्द है, जो अंततः दवा बन जाने कीक्षमता रखता है, पानी के बुलबुलों से नाजूक, रिश्तेदारी, यहां किसी शास्त्र की विद्या हो उठती है।इसी कथा कृति में उपन्यास की भाषा ने किन्हीं मूर्तियों पर छेनी-हथौड़ी का काम किया है। कुसम जी ने साहित्य की अनेक विधाओं में निरंतर सृजन किया है।\u003c\/span\u003e\u003c\/div\u003e","brand":"कुसुम कुमार","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48286541906087,"sku":null,"price":425.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/man_1.png?v=1774941168"},{"product_id":"कालचिती-kaalchiti-novel-in-hindi","title":"कालचिती (Kaalchiti) Novel in Hindi","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eयह उपन्यास है… उस हौसले और हिम्मत के लिए, जो अपने हक के लिए लड़ती है… उस आदिम, जीवट, अथक संघर्षशीलता के लिए… उस इनकलाबी भावना के लिए, जो हर दौर में जिंदा होती है… सत्ता पोषित हिंसा के खिलाफ… जन-विमुख, भ्रष्ट सत्ता और कॉरपोरेट गठबंधन के खिलाफ… उस आततायी सत्ता के खिलाफ… जो सोनी सोरी जैसों के खिलाफ घृणित षड्यंत्र रचती है! निर्धन, निहत्थे, शांतिप्रिय आदिम मनुष्यों का संहार करने वाली राजनीति के खिलाफ…! प्रस्तुत उपन्यास अर्ध गल्प और अर्ध समकालीन यथार्थ! क्योंकि चाहे कथा और पात्र काल्पनिक हों, कुछ घटनाएँ वास्तविकता पर आधारित हैं। पहाड़-पानी और वन एवं भूमि सहित सामान्य मनुष्यों पर बलपूर्वक अधिकार करना अनैतिक है। केवल आम जन के समसामयिक उत्पीड़न को व्यक्त करना और ऐसे हिंड्ड कृत्यों की निंदा करना ही इस रचना का एकमात्र ध्येय है। जनजातीय समुदायों, मूलवासियों और आदिम संस्कृतियों पर इस दौर में हो रहे सत्ता-पोषित दमन का प्रतिवाद करना प्रत्येक विवेकशील नागरिक का कर्तव्य है। यह गद्य-पुस्तक सर्वमान्य मानवाधिकारों, सच्चे लोकतंत्र के पक्ष में और मनुष्य की स्वतंत्रता के हनन के सभी प्रकार के कृत्यों के विरुद्ध है।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"शेखर मल्लिक","offers":[{"title":"Default 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विवाह विच्छेद, तलाक के बाद प्रेम को फिर विवाह में बदलने की आकांक्षा, पुत्र और उसका पारिवारिक परिदृश्य—ऐसी अनेक बातों से मिलकर इस उपन्यास की कथावस्तु निर्मित हुई है। इस निर्मिति में निशांत, अनुराग, दामोदर, रोहन आदि बहुत दिलचस्प तरीके से शामिल हैं। पिया के लिए सेक्स कोई दुराग्रह नहीं है, पर वह ‘साथ’ चाहती है। विवाह इसीलिए उसे आश्वस्त और आकर्षित करता है। लेकिन नियति या मानव स्वभाव का निर्णय कुछ दूसरा है। सुषम बेदी कथानक को गतिशील रखते हुए जीवन की मूलभूत चिंताओं पर बात करती हैं। स्वाभाविक रूप से स्त्री-विमर्श भी आता है। पिया के बारे में लेखिका का कथन है, ‘अनुराग ने उसके फूलों की गुलाबी रंगत ही देखी थी। पर वहां खून के थक्के भी जमे हुए थे।’ ऐसी जाने कितनी विडंबनाएं इस उपन्यास को स्त्री-जीवन का मार्मिक दस्तावेज बना देती हैं। सुषम बेदी का लंबा जीवनानुभव और जनमनोविज्ञान समझने का ढंग भाषा के अनूठे स्वरूप में व्यक्त हुआ है। बेहद पठनीय और विचारोत्तेजक उपन्यास।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"सुषम बेदी","offers":[{"title":"Default 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रिश्तों की बुनियाद पर यह उपन्यास विश्व का वह समस्त जीवन अपने आप में समेटे हुए है जिसमें तकरार है, तुनुकमिजाजी है, हँसी है, बैर होने के बाद भी जिनमें अपनापन है और वह अदृश्य प्रेम है जो अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए पहाड़ों की अजेय दीवारों को तोड़ते हुए अपनी सारी हदें पार कर जाना चाहता है। खेत-खलिहान, नदियाँ, झरनेµसब एक ही जैसे तो हैं। फिर दुनिया भर के पहाड़ी भागों को हम एक-दूसरे से अलग कैसे कर सकते हैं। प्रेम यहाँ भी है तो प्रेम वहाँ भी है। बंदिश यहाँ भी है तो वहाँ भी है। बदले की भावनाएँ यहाँ भी हैं तो वहाँ भी। पहाड़ की कंदराओं में छटपटाने वाला प्रेम यहाँ भी है तो वहाँ भी है। इस उपन्यास में प्रेम का जो वर्णन है वह पूरे विश्व का वर्णन है। एक बेहद अनूठा और कोमल प्रेम। पहाड़ों का अप्रतिम सौंदर्य ही देश की खूबसूरती होती है। सघन वनों के, बहती नदियों के, बहते खूूबसूरत झरनों के बीच जब कोई प्यार पनपता है तो उस प्यार की कल्पनाएँ, इच्छाएँ, सपने, उड़ानें असीमित होती हैं। उनकी कोई सीमा नहीं होती। मिट्टी में से जिस तरह कोई बीज फूटकर पौधे के रूप में पल्लवित होना चाहता है उसी तरह से पहाड़ों की गहराइयों में जब कोई प्यार पनपता है तो उसका कोई ओर-छोर नहीं होता। वह पनपता है और वहीं दफन हो जाता है।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"रणीराम गढ़वाली","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48286758666407,"sku":null,"price":300.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/eknt.png?v=1774943045"},{"product_id":"उनके-हस्ताक्षर-unke-hastakshar-novel-in-hindi","title":"उनके हस्ताक्षर (Unke Hastakshar) Novel in Hindi","description":"\u003cdiv\u003e\u003cspan\u003eउनके हस्ताक्षर ० एक लम्बा रास्ता गुजर गया, जब एक उपन्यास लिखा था, डॉक्टर देव । मन में आया, अगर उसका अनुवाद मैं अब स्वयं करूँ, तो उसकी रगों में कुछ धड़कने लगेगा और यही जब करने लगी, तो बहुत कुछ बदल गया । ० इसी तरह एक मुद्दत हो गई, एक उपन्यास लिखा था…'घोंसला' । प्रकाशित हुआ तो बाद में किफायती संस्करण 'नीना' नाम से चलता रहा । आज उसे देखकर लगा कि वह उस कदर पुख्ता नहीं हो पाया था, जो होना चाहिए था । और उसी को अब फिर से लिखा है, जिससे वह सघन भी हो पाया है और पुख्ता 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है, जो मानव रिश्तों और पुरुष-महिला संबंधों की जटिलताओं को दर्शाता है। यह कहानी मुख्य रूप से स्वतंत्र पुरुषों की मानसिक पीड़ा और प्रेम संबंधों की भावनात्मक गहराई को उजागर करती है, \u003c\/span\u003e\u003cspan\u003e\u003c\/span\u003e\u003cspan\u003eयह पारंपरिक प्रेम कहानियों से इतर, पुरुष-महिला के आधुनिक रिश्तों की जटिलता और उसमें छिपी मनोवैज्ञानिक पीड़ा को चित्रित करता है।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"अमृता प्रीतम","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48314384318631,"sku":null,"price":190.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/radha.png?v=1775191677"},{"product_id":"कम्मी-और-नंदा-kammi-or-nanda","title":"कम्मी और नंदा (Kammi or Nanda)","description":"\u003cp data-start=\"89\" data-end=\"266\"\u003eदो बेहद भावनात्मक और दिल को छू लेने वाली लघु उपन्यासिकाएँ।\u003cbr data-start=\"147\" data-end=\"150\"\u003eइनमें से \u003cem data-start=\"159\" data-end=\"166\"\u003eकम्मी\u003c\/em\u003e विशेष रूप से ऐसा पात्र है, जो अपनी सादगी, सच्चाई और दिल की सुंदरता से पाठक को अपनी ओर खींच लेता है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp data-start=\"268\" data-end=\"544\"\u003e\u003cem data-start=\"268\" data-end=\"275\"\u003eकम्मी\u003c\/em\u003e एक युवा स्त्री की कहानी है, जिसने अपने बचपन में अपनी माँ पर अपने पिता द्वारा किए गए अत्याचार को देखा — जो अंततः उसकी माँ की मृत्यु का कारण बना।\u003cbr data-start=\"419\" data-end=\"422\"\u003eसमय के साथ, उसके भीतर यह विश्वास जन्म लेता है कि जीवन में पूर्णता पाने के लिए उसे किसी पुरुष के सहारे की आवश्यकता नहीं है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp data-start=\"546\" data-end=\"804\"\u003eवह अपने जीवन को एक दूरस्थ गाँव में शिक्षिका के रूप में समर्पित कर देती है — मानो जीवन के दर्द से बचने का एक रास्ता हो।\u003cbr data-start=\"664\" data-end=\"667\"\u003eलेकिन उसका मार्गदर्शक उसे समझाता है कि जीवन से भागना समाधान नहीं है, बल्कि जीवन जो भी दे, उसे खुले मन से स्वीकार करना ही सच्ची प्रगति है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp data-start=\"806\" data-end=\"1030\"\u003eपरिस्थितियाँ ऐसी बनती हैं कि कम्मी दो बार संबंधों में पड़ती है, और दोनों बार उसे अलग-अलग तरह से धोखा मिलता है।\u003cbr data-start=\"916\" data-end=\"919\"\u003eफिर भी, इन अनुभवों के माध्यम से वह अपने भीतर की शक्ति को पहचानती है और अंततः अपने जीवन का उद्देश्य समझ पाती है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp data-start=\"1032\" data-end=\"1171\"\u003eकहानी का अंत तब होता है जब कम्मी अपने गर्भस्थ शिशु के साथ अपने गाँव के स्कूल लौटती है — यह निश्चय करके कि वह अपने बच्चे को स्वयं ही पालेगी।\u003c\/p\u003e","brand":"अमृता प्रीतम","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48325303959719,"sku":null,"price":170.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/kammi.png?v=1775276910"},{"product_id":"रतना-और-चेतना-ratana-or-chetna-novel","title":"रतना और चेतना (Ratana or Chetna) Novel","description":"\u003cdiv\u003e\n\u003cspan\u003eरतना उपन्यास की नायिका है। इस उपन्यास के पास आए दिन होने वाली घटनाओं की जमीन है, लेकिन इसकी इमारत को जिस पहलू ने आबाद किया है, उसे मेरी कल्पना ने गढ़ा और तराशा है… इस उपन्यास के आधार पर 1976 में ‘डाकू’ नाम की एक फिल्म बनी थी।\u003c\/span\u003e\u003cbr\u003e\u003cspan\u003eचेतना सागर और सीपियाँ उपन्यास की नायिका है। यह उपन्यास उस भयानक को लिए हुए है, जिसकी जमीन पर ऐसी घटनाएँ होती हैं, जो मन के फूलों को पनपने नहीं देतीं। लेकिन इसी उपन्यास में किसी को यह चेतना भी सामने जाती है, जो अपनी जिंदगी के सवाल को अपने हाथ में ले लेती इस उपन्यास पर आधारित 1975 में ‘कादम्बरी’ नाम से एक फिल्म बनी थी।\u003c\/span\u003e\n\u003c\/div\u003e","brand":"अमृता प्रीतम","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48325407834279,"sku":null,"price":200.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/ratna.png?v=1775277729"},{"product_id":"विषाद-मठ-vishad-math-novel-in-hindi","title":"विषाद मठ (Vishad Math) Novel in Hindi","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eजब मुगलों का राज्य समाप्त होने पर आया था तब बंगाल की हरी-भरी धरती पर अकाल पड़ा था। उस समय बंकिमचंद्र चटर्जी ने ‘आनंद मठ’ लिखा था। जब अंगरेजों का राज्य समाप्त होने पर आया तब फिर बंगाल की हरी-बरी धरती पर अकाल पड़ा। उसका वर्णन करते हुए मैंने इसीलिए इस पुस्तक को ‘विषाद मठ’ नाम दिया। प्रस्तुत उपन्यास तत्कालीन जनता का सच्चा इतिहास है। इसमें एक भी अत्युक्ति नहीं, कहीं भी जबर्दस्ती अकाल की भीषणता को गढ़ने के लिए कोई मनगढ़ंत कहानी नहीं। जो कुछ है, यदि सामान्य रूप से दिमाग में, बहुत अमानुषिक होने के कारण, आसानी से नहीं बैठता, तब भी अविश्वास की निर्बलता दिखाकर ही इतिहास को भी तो फुसलाया नहीं जा सकता। ‘विषाद मठ’ हमारे भारतीय साहित्य की महान् परंपरा की एक छोटी-सी कड़ी है। जीवन अपार है, अपार वेदना भी है, किंतु यह श्रृंखला भी अपना स्थायी महत्त्व रखती है। -रांगेय राघव\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"रांगेय राघव","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48362590109863,"sku":null,"price":250.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/vishad_1.png?v=1775628697"},{"product_id":"आवरण-aavaran-novel-in-hindi","title":"आवरण (Aavaran) Novel in Hindi","description":"\u003cdiv\u003e\n\u003cp\u003e'आवरण'  एक अत्यधिक चर्चित और विवादास्पद उपन्यास है, जो भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन और ऐतिहासिक अत्याचारों पर पर्दा डालने के विमर्श पर केंद्रित है।  लक्ष्मी नामक एक स्वतंत्र विचारों वाली हिंदू महिला एक मुस्लिम पुरुष से शादी करती है, लेकिन बाद में उसे अत्याचार, विश्वासघात और इस्लाम में जबरन धर्मांतरण का सामना करना पड़ता है। अंत में वह अपने सच को वापस पाने की यात्रा पर निकलती है। यह उपन्यास बताता है कि कैसे तथाकथित धर्मनिरपेक्ष-उदारवादी इतिहासकार भारत के सच्चे इतिहास को छिपाते हैं। पुस्तक में मुगलों द्वारा हिंदू मंदिरों के विध्वंस और अन्य अत्याचारों को तर्कों के साथ प्रस्तुत किया गया है। इसके सीधे और कड़वे लेखन के कारण, कई लोगों ने इसकी आलोचना भी की है, लेकिन यह अपनी लोकप्रियता के कारण यह उपन्यास बार-बार पुनर्मुद्रित किया गया। भैराप्पा इस उपन्यास के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि सामाजिक सद्भाव झूठी धारणाओं पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सच्चाई को स्वीकार करने पर आधारित होना चाहिए। \u003c\/p\u003e\n\u003c\/div\u003e","brand":"एस० एल० भैरप्पा","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48391948959911,"sku":null,"price":450.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/ramakant_1.png?v=1775961849"},{"product_id":"युगदृष्टा-शिवाजी-yugdrishta-shivaji-historical-novel-biography","title":"युगदृष्टा शिवाजी (Yugdrishta Shivaji) Historical Novel, Biography","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eराष्ट्रकवि ने खूब कहा है— ‘राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है। कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है।।’ महापुरुषों की हार्दिकता से गायी गई गाथा सदैव आनंददायी है। मध्ययुग में रूढि़वादिता और धर्मांधता के छाए घने अंधेरे के बीच शिवाजी ने मानव स्वतंत्रता का जो दीप जलाया था, वह आज भी प्रज्वलित है। हमें धीरज बंधता है कि देर है, अंधेर नहीं। सुहानी सुबह उजाला लाएगी और हम तन-मन से, बंधनमुक्त होंगे। आधुनिक युग को लें। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने उद्घोष किया था—‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।’ उन्होंने शिवाजी जयंती पर बृहत् आयोजन किया, जिसकी अध्यक्षता करते हुए स्वामी विवेकानंद ने शिवाजी को, उचित ही, देश का महानायक कहा था। यह उपन्यास शिवाजी के प्रेरक व्यक्तित्व और कृतित्व की गाथा कहता है। कथा इतिहास पर आधरित है, इसे बयान करने में उपन्यासकार की कल्पना की उतनी ही भूमिका है, जितनी शुद्ध सोने में लगे टांके की, जो उसे गहने में ढालती है। उपन्यास पढ़ देखिए। रोचक कथा। गतिमय शैली।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"शशिभूषण सिंहल","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48392365736103,"sku":null,"price":250.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/shivaji.png?v=1775968948"},{"product_id":"देना-पावना-dena-paavna-novel-in-hindi","title":"देना-पावना (Dena-Paavna) Novel in Hindi","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eबाँग्ला के अमर कथाशिल्पी शरत्चन्द्र चट्टोपाध्याय प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में पढ़े जाने वाले शीर्षस्थ उपन्यासकार हैं। उनके कथा-साहित्य की प्रस्तुति जिस रूप-स्वरूप में भी हुई, लोकप्रियता के तत्त्व ने उसके पाठकीय आस्वाद में वृद्धि ही की। सम्भवतः वह अकेले ऐसे भारतीय कथाकार भी हैं, जिनकी अधिकांश कालजयी कृतियों पर फिल्में बनीं तथा अनेक धारावाहिक सीरियल भी। ‘देवदास’, ‘चरित्राहीन’ और ‘श्रीकान्त’ के साथ तो यह बारम्बार घटित हुआ है। अपने विपुल लेखन के माध्यम से शरत् बाबू ने मनुष्य को उसकी मर्यादा सौंपी और समाज की उन तथाकथित ‘परम्पराओं’ को ध्वस्त किया, जिनके अन्तर्गत नारी की आँखें अनिच्छित आँसुओं से हमेशा छलछलाई रहती हैं। समाज द्वारा अनसुनी रह गई वंचितों की बिलख-चीख और आर्तनाद को उन्होंने परखा तथा गहरे पैठकर यह जाना कि जाति, वंश और धर्म आदि के नाम पर एक बड़े वर्ग को मनुष्य की श्रेणी से ही अपदस्थ किया जा रहा है। इस षड्यन्त्रा के अन्तर्गत पनप रही तथाकथित सामाजिक ‘आम सहमति’ पर उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से रचनात्मक हस्तक्षेप किया, जिसके चलते वह लाखों-करोड़ों पाठकों के चहेते शब्दकार बने। नारी और अन्य शोषित समाजों के धूसर जीवन का उन्होंने चित्राण ही नहीं किया, बल्कि उनके आम जीवन में आच्छादित इन्द्रधनुषी रंगों की छटा भी बिखेरी। प्रेम को आध्यात्मिकता तक ले जाने में शरत् का विरल योगदान है। शरत्-साहित्य आम आदमी के जीवन को जीवंत करने में सहायक जड़ी-बूटी सिद्ध हुआ है। हिन्दी के एक विनम्र प्रकाशक होने के नाते हमारा यह उत्तरदायित्व बनता ही था कि शरत्-साहित्य को उसके मूलतम ‘पाठ’ के अन्तर्गत अलंकृत करके पाठकों को सौंप सकें, अतः अब यह प्रस्तुति आपके हाथों में है। हमारा प्रयास रहेगा कि किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और प्रकाश्य शरत्-साहित्य को सर्वांग तथा सर्वश्रेष्ठ होने का प्रमाणपत्रा आप जैसे सुधी पाठकों द्वारा ही जारी किया जाए।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय","offers":[{"title":"Default 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इन्द्रधनुषी रंगों की छटा भी बिखेरी। प्रेम को आध्यात्मिकता तक ले जाने में शरत् का विरल योगदान है। शरत्-साहित्य आम आदमी के जीवन को जीवंत करने में सहायक जड़ी-बूटी सिद्ध हुआ है। हिन्दी के एक विनम्र प्रकाशक होने के नाते हमारा यह उत्तरदायित्व बनता ही था कि शरत्-साहित्य को उसके मूलतम ‘पाठ’ के अन्तर्गत अलंकृत करके पाठकों को सौंप सकें, अतः अब यह प्रस्तुति आपके हाथों में है। हमारा प्रयास रहेगा कि किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और प्रकाश्य शरत्-साहित्य को सर्वांग तथा सर्वश्रेष्ठ होने का प्रमाणपत्रा आप जैसे सुधी पाठकों द्वारा ही जारी किया जाए।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48417563803815,"sku":null,"price":300.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/dutta.png?v=1776241282"},{"product_id":"विराजबहू-viraj-bahu-novel-in-hindi","title":"विराजबहू (Viraj Bahu) Novel in Hindi","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eबाँग्ला के अमर कथाशिल्पी शरत्चन्द्र चट्टोपाध्याय प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में पढ़े जाने वाले शीर्षस्थ उपन्यासकार हैं। उनके कथा-साहित्य की प्रस्तुति जिस रूप-स्वरूप में भी हुई, लोकप्रियता के तत्त्व ने उसके पाठकीय आस्वाद में वृद्धि ही की। सम्भवतः वह अकेले ऐसे भारतीय कथाकार भी हैं, जिनकी अधिकांश कालजयी कृतियों पर फिल्में बनीं तथा अनेक धारावाहिक सीरियल भी। ‘देवदास’, ‘चरित्राहीन’ और ‘श्रीकान्त’ के साथ तो यह बारम्बार घटित हुआ है। अपने विपुल लेखन के माध्यम से शरत् बाबू ने मनुष्य को उसकी मर्यादा सौंपी और समाज की उन तथाकथित ‘परम्पराओं’ को ध्वस्त किया, जिनके अन्तर्गत नारी की आँखें अनिच्छित आँसुओं से हमेशा छलछलाई रहती हैं। समाज द्वारा अनसुनी रह गई वंचितों की बिलख-चीख और आर्तनाद को उन्होंने परखा तथा गहरे पैठकर यह जाना कि जाति, वंश और धर्म आदि के नाम पर एक बड़े वर्ग को मनुष्य की श्रेणी से ही अपदस्थ किया जा रहा है। इस षड्यन्त्रा के अन्तर्गत पनप रही तथाकथित सामाजिक ‘आम सहमति’ पर उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से रचनात्मक हस्तक्षेप किया, जिसके चलते वह लाखों-करोड़ों पाठकों के चहेते शब्दकार बने। नारी और अन्य शोषित समाजों के धूसर जीवन का उन्होंने चित्राण ही नहीं किया, बल्कि उनके आम जीवन में आच्छादित इन्द्रधनुषी रंगों की छटा भी बिखेरी। प्रेम को आध्यात्मिकता तक ले जाने में शरत् का विरल योगदान है। शरत्-साहित्य आम आदमी के जीवन को जीवंत करने में सहायक जड़ी-बूटी सिद्ध हुआ है। हिन्दी के एक विनम्र प्रकाशक होने के नाते हमारा यह उत्तरदायित्व बनता ही था कि शरत्-साहित्य को उसके मूलतम ‘पाठ’ के अन्तर्गत अलंकृत करके पाठकों को सौंप सकें, अतः अब यह प्रस्तुति आपके हाथों में है। हमारा प्रयास रहेगा कि किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और प्रकाश्य शरत्-साहित्य को सर्वांग तथा सर्वश्रेष्ठ होने का प्रमाणपत्रा आप जैसे सुधी पाठकों द्वारा ही जारी किया जाए।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48418012168359,"sku":null,"price":120.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/viraj.png?v=1776241604"},{"product_id":"शुभदा-shubhda-novel-in-hindi","title":"शुभदा (Shubhda) Novel in Hindi","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eबाँग्ला के अमर कथाशिल्पी शरत्चन्द्र चट्टोपाध्याय प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में पढ़े जाने वाले शीर्षस्थ उपन्यासकार हैं। उनके कथा-साहित्य की प्रस्तुति जिस रूप-स्वरूप में भी हुई, लोकप्रियता के तत्त्व ने उसके पाठकीय आस्वाद में वृद्धि ही की। सम्भवतः वह अकेले ऐसे भारतीय कथाकार भी हैं, जिनकी अधिकांश कालजयी कृतियों पर फिल्में बनीं तथा अनेक धारावाहिक सीरियल भी। ‘देवदास’, ‘चरित्राहीन’ और ‘श्रीकान्त’ के साथ तो यह बारम्बार घटित हुआ है। अपने विपुल लेखन के माध्यम से शरत् बाबू ने मनुष्य को उसकी मर्यादा सौंपी और समाज की उन तथाकथित ‘परम्पराओं’ को ध्वस्त किया, जिनके अन्तर्गत नारी की आँखें अनिच्छित आँसुओं से हमेशा छलछलाई रहती हैं। समाज द्वारा अनसुनी रह गई वंचितों की बिलख-चीख और आर्तनाद को उन्होंने परखा तथा गहरे पैठकर यह जाना कि जाति, वंश और धर्म आदि के नाम पर एक बड़े वर्ग को मनुष्य की श्रेणी से ही अपदस्थ किया जा रहा है। इस षड्यन्त्रा के अन्तर्गत पनप रही तथाकथित सामाजिक ‘आम सहमति’ पर उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से रचनात्मक हस्तक्षेप किया, जिसके चलते वह लाखों-करोड़ों पाठकों के चहेते शब्दकार बने। नारी और अन्य शोषित समाजों के धूसर जीवन का उन्होंने चित्राण ही नहीं किया, बल्कि उनके आम जीवन में आच्छादित इन्द्रधनुषी रंगों की छटा भी बिखेरी। प्रेम को आध्यात्मिकता तक ले जाने में शरत् का विरल योगदान है। शरत्-साहित्य आम आदमी के जीवन को जीवंत करने में सहायक जड़ी-बूटी सिद्ध हुआ है। हिन्दी के एक विनम्र प्रकाशक होने के नाते हमारा यह उत्तरदायित्व बनता ही था कि शरत्-साहित्य को उसके मूलतम ‘पाठ’ के अन्तर्गत अलंकृत करके पाठकों को सौंप सकें, अतः अब यह प्रस्तुति आपके हाथों में है। हमारा प्रयास रहेगा कि किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और प्रकाश्य शरत्-साहित्य को सर्वांग तथा सर्वश्रेष्ठ होने का प्रमाणपत्र आप जैसे सुधी पाठकों द्वारा ही जारी किया जाए।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय","offers":[{"title":"Default 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बिलख-चीख और आर्तनाद को उन्होंने परखा तथा गहरे पैठकर यह जाना कि जाति, वंश और धर्म आदि के नाम पर एक बड़े वर्ग को मनुष्य की श्रेणी से ही अपदस्थ किया जा रहा है। इस षड्यन्त्रा के अन्तर्गत पनप रही तथाकथित सामाजिक ‘आम सहमति’ पर उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से रचनात्मक हस्तक्षेप किया, जिसके चलते वह लाखों-करोड़ों पाठकों के चहेते शब्दकार बने। नारी और अन्य शोषित समाजों के धूसर जीवन का उन्होंने चित्राण ही नहीं किया, बल्कि उनके आम जीवन में आच्छादित इन्द्रधनुषी रंगों की छटा भी बिखेरी। प्रेम को आध्यात्मिकता तक ले जाने में शरत् का विरल योगदान है। शरत्-साहित्य आम आदमी के जीवन को जीवंत करने में सहायक जड़ी-बूटी सिद्ध हुआ है। हिन्दी के एक विनम्र प्रकाशक होने के नाते हमारा यह उत्तरदायित्व बनता ही था कि शरत्-साहित्य को उसके मूलतम ‘पाठ’ के अन्तर्गत अलंकृत करके पाठकों को सौंप सकें, अतः अब यह प्रस्तुति आपके हाथों में है। हमारा प्रयास रहेगा कि किताबघर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और प्रकाश्य शरत्-साहित्य को सर्वांग तथा सर्वश्रेष्ठ होने का प्रमाणपत्रा आप जैसे सुधी पाठकों द्वारा ही जारी किया 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प्रकार यह मौलिक कृति नहीं कहलाएगी । उनकी आशंका अपने स्थान पर उचित थी किन्तु मेरे लिए चुनौती । चुनौती स्वीकारते हुए मैंने गीता पर आधारित उपन्यास ही लिखने का अन्तिम निर्णय लिया । -  लेखक\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"राजेन्द्र त्यागी","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48502559473831,"sku":null,"price":400.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/yogkshem.png?v=1776397906"},{"product_id":"एक-किरण-सौ-झाइयाँ-ek-kiran-sau-jhaiyan-novel-in-hindi","title":"एक किरण सौ झाइयाँ (Ek Kiran Sau Jhaiyan) Novel in Hindi","description":"","brand":"आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48502883516583,"sku":null,"price":160.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/kiran.png?v=1776398431"},{"product_id":"छोर-chhor-novel-in-hindi","title":"छोर (Chhor) Novel in Hindi","description":"\u003cdiv\u003e\n\u003cspan class=\"gmail-T286Pc\"\u003eयह एक मनोवैज्ञानिक और संबंधों पर आधारित उपन्यास है। \u003c\/span\u003e\u003cspan\u003eयह दो मुख्य पात्रों के बीच के मानसिक और भावनात्मक 'छोर' (किनारों) को चित्रित करता है, जिसमें प्रेम, ईर्ष्या और मानवीय स्वभाव की जटिलताओं को दिखाया गया है।\u003c\/span\u003e\n\u003c\/div\u003e\n\u003cdiv\u003e\n\u003cdiv class=\"gmail-Y3BBE\"\u003eयह उपन्यास रिश्तों की नाजुकता और मानवीय भावनाओं के उतार-चढ़ाव को समझने के लिए एक गंभीर साहित्यिक कृति मानी जाती है।\u003c\/div\u003e\n\u003c\/div\u003e","brand":"एस० एल० भैरप्पा","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48578422669479,"sku":null,"price":400.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/chhor.png?v=1776532634"},{"product_id":"जिज्ञासा-jigyasa-novel-in-hindi","title":"जिज्ञासा (Jigyasa) Novel in Hindi","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eउत्कंठा को भड़काने वाला डॉ० भैरप्पा जी का जिज्ञासा उपन्यास एक बेजोड़ रचना है। उपन्यास के आरंभ से लेकर अंत तक एक ऐसे कथा-नायक की जीवनी के प्रति जिज्ञासा बनी रहती है जो मंच पर स्वयं बिरले ही दिखाई पड़ता है। सारे उपन्यास में उस परोक्ष कथा-नायक विश्वनाथ की जीवनी के अन्वेषण का ताना-बाना यों सशक्त तकनीक से प्रस्तुत किया गया है कि जिसके माध्यम से उपन्यास के अन्य पात्र भी अपने निजी जीवन का विश्लेषण करने के लिए विवश हो जाते हैं। विश्वनाथ अपने आप में एक पहेली-सा बना हुआ, अपनी अस्मिता की खोज में भटकता हुआ और अन्य पात्रों की कुंठाओं को कुरेदते हुए आगे निकल जाता रहता है। जिज्ञासा की विशेषता यह है कि विश्वनाथ की जीवनी से उलझे हुए पात्रों में स्वयं पाठक भी अपना कोई धूमिल-सा चेहरा पहचानने की चेष्टा अपने आप करने लगता है। विश्वनाथ की जीवनी के बहुमुखी झरोखे से झाँकने की उत्कंठा पाठक में बराबर बनी रहती है और उसे पहचानने की जिज्ञासा कभी शांत नहीं होती। विश्वनाथ की अस्मिता पाठक के मन पर अपना स्थायी प्रभाव छोड़ जाती है। \u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"एस० एल० भैरप्पा","offers":[{"title":"Default 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सरकारी तौर पर नहीं कह रहा हूँ, ऐसा लगता है कि उनमें किसी बात पर झगडा हो रहा होगा, अचानक गुस्से में आकर एक पीतल की ऐश ट्रै फेंककर मारी, वह जाकर नस पर लगी, उससे आपकी बेटी बेहोश होक रगिर पडी, उसके बाद... [ इस उपन्यास से]\u003c\/span\u003e\u003c\/div\u003e","brand":"महाश्वेता देवी","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48757085798567,"sku":null,"price":110.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/jakdan.png?v=1776840452"},{"product_id":"नाव-न-बाँधो-ऐसी-ठौर-naav-na-bandho-aisi-thor-novel-in-hindi","title":"नाव न बाँधो ऐसी ठौर (Naav Na Bandho Aisi Thor) Novel in Hindi","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eहिंदी के सुपरिचित कथाकार दिनेश पाठक के इस उपन्यास का केंद्रीय विषय है प्रेम। यह विवाहेतर प्रेम है, जिसका अपना अलग रंग है और अलग संघर्ष भी। नारी-पुरुषजन्य आकर्षण प्रकृति का सहज स्वभाव है। यह स्वभाव इतना प्रबल है, इतना अदम्य कि बावजूद तमाम वर्जनाओं के इसकी धार सतत प्रवाहित रहती है। इस आकर्षण में न तो कोई उम्र होती है और न ही कोई शर्त। कब, कहाँ और कैसे दो विपरीत एक-दूसरे के प्रति आकृष्ट होकर साडी वर्जनाओं को चुनौती देने लगेंगे, कहना मुश्किल है। आज के दौर में जब स्त्री-पुरुष साथ-साथ काम कर रहे हैं, कंधे से कंधा मिलकर, तब इस आकर्षण की परिधि और व्यापक हो उठी है। साथ-साथ काम करते हुए कब दो प्राणी चुपके से एक-दूसरे की भावनाओं में भी शामिल हो जाते हैं, ज्ञात नहीं पद्त। और यदि वे दोनों ही पहले से विवाहित हों तो भावनाओ का यह ज्वार एक नयी समस्या को जन्म देता है - सामाजिक दृष्टि से कदाचित यह अवैध प्रेम है, एकदम वर्जित व निषिद्ध प्रेम, विवाह-व्यवस्था के नितांत विपरीता उपन्यास में एक साथ दो धुरियां हैं-एक में समाज के विखंडन का भय है, परंपरागत मान्यताओं-मूल्यों के साथ परिवारों के टूटने व समाज के अराजक होने का डर है तो दूसरे में व्यक्ति स्वातंत्र्य के आगे सामाजिक मूल्यों के प्रति अस्वीकार का भाव। प्रश्न है विवाहित स्त्री-पुरुष के बीच क्या यह विवाहेतर प्रेम-सम्बन्ध सही है ? निष्कर्ष पर तो पाठकों को पहुंचना है।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"दिनेश पाठक","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48757673820327,"sku":null,"price":250.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/naav.png?v=1776840869"},{"product_id":"महायात्रा-गाथा-4-खंड-mahayatra-gatha-4-vols-historical-fiction-bestseller","title":"‘महायात्रा गाथा’ (4 खंड ) \/ Mahayatra Gatha ( 4 Vols.) Historical Fiction, Bestseller","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003e‘महायात्रा गाथा’ मानव इतिहास की उस दीर्घ यात्रा को प्रस्तुत करती है, जिसकी शुरुआत प्रागैतिहासिक काल से मानी जाती है—लगभग 5000 ई.पू. से भी पहले, जब मानव ने प्रकृति के बीच अपना अस्तित्व गढ़ना शुरू किया।\u003c\/span\u003e\u003cbr\u003e\u003cspan\u003eइन्द्र से मांधाता (5500 ई.पू. से 3500 ई.पू.) और मांधाता से जनमेजय (3500 ई.पू. से 1500 ई.पू.) तक की यात्रा मानव सभ्यता के प्रारंभिक विकास, संघर्ष और सामाजिक संरचना को दर्शाती है।\u003c\/span\u003e\u003cbr\u003e\u003cspan\u003eजनमेजय से अजातशत्रु (1500 ई.पू. से 600 ई.पू.) और फिर अजातशत्रु से हर्षवर्धन (600 ई.पू. से 700 ई.) तक आते-आते इतिहास अधिक स्पष्ट और संगठित रूप लेने लगता है।\u003c\/span\u003e\u003cbr\u003e\u003cspan\u003eहर्षवर्धन से पृथ्वीराज चौहान (700 ई. से 1200 ई.) तक का काल भारतीय संस्कृति, राजनीति और युद्धों के उत्कर्ष का प्रतीक है।\u003c\/span\u003e\u003cbr\u003e\u003cspan\u003eयह संपूर्ण यात्रा केवल घटनाओं का वर्णन नहीं, बल्कि मनुष्य के बौद्धिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास का जीवंत चित्रण है।\u003c\/span\u003e\u003cbr\u003e\u003cspan\u003eरांगेय राघव ने इस कृति में इतिहास को केवल तथ्य नहीं, बल्कि एक प्रवाहमान कथा के रूप में प्रस्तुत किया है।\u003c\/span\u003e\u003cbr\u003e\u003cspan\u003eइस प्रकार ‘महायात्रा गाथा’ मानव सभ्यता के उद्भव से लेकर उसके उत्कर्ष तक की कालजयी ऐतिहासिक गाथा बन जाती है।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"रांगेय राघव","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48965398855847,"sku":null,"price":1450.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/maha-1fb.png?v=1777184963"},{"product_id":"बेतवा-बहती-रही-betwa-bahti-rahi-novel-in-hindi","title":"बेतवा बहती रही (Betwa Bahti Rahi) Novel in Hindi","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eएक बेतवा! एक मीरा ! एक उर्वशी ! नही-नहीं, यह अनेक उर्वशियों, अनेक मीराओं, अनेक बेतवाओं की कहानी है । बेतवा के किनारे जंगल की तरह उगी मैली बस्तियों । भाग्य पर भरोसा रखने वाले दीन-हीन किसान । शोषण के सतत प्रवाह में डूबा समाज । एक अनोखा समाज, अनेक प्रश्नों, प्रश्नचिन्हों से घिरा । प्राचीन रूढियां है जहाँ सनातन । अंधविश्वास हैं अंतहीन । अशिक्षा का गहरा अंधियारा । शताब्दियों से चली आ रही अमानवीय यंत्रणाएँ । फिर जीने के लिए कोई किंचित ठौर खोजे भी तो कहाँ ! हाँ, इन अंधेरी खोहों और खाइयों में कभी-कभी मुट्ठी-भर किरणों के प्रतिबिंब का अहसास भी कितना कुछ नहीं दे जाता । उर्वशी का दु:ख है कि वह उर्वशी है । साधारण में भी असाधारण । इसीलिए सब तरह से अभिशप्त रही । तिल-तिल मिटती रही चुपचाप । प्रेम, वासना, हिंसा, घृणा से भरी एक हृदयद्रावक अछूती कहानी ! पूरे एक अंचल को व्यथा-कथा ।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"मैत्रेयी पुष्पा","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":49571637756071,"sku":null,"price":300.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/Betwa.png?v=1778299515"},{"product_id":"नतोऽहं-natoham-novel-in-hindi","title":"नतोऽहं (Natoham) Novel in Hindi","description":"\u003cp\u003eलब्धप्रतिष्ठ रचनाकार मीनाक्षी स्वामी का बहुचर्चित उपन्यास “नतोऽहं\" भारतभूमि के वैभवशाली अतीत और वर्तमान गौरव के सम्मुख विश्व के नतमस्तक होने का साक्षी है। यह भारतीय संस्कृति की बाह्य जगत् से आंतरिक जगत् की विस्मयकारी यात्रा करवाने की सामर्थ्य के अनावरण का अद्भुत परिणाम हे। भारतीय संस्कृति के विराट् वैभव का दर्शन होता है-सांस्कृतिक नगरी उज्जयिनी में बारह वर्षों में होने वाले सिंहस्थ के विश्वस्तरीय आयोजन में। उज्जयिनी का केंद्र शिप्रा है। इसके किनारे होने वाले सिंहस्थ में देश भर के आध्यात्मिक रहस्य और सिद्धियां एकजुट हो जाती हैं। इन्हें देखने, जानने को विश्व भर के जिज्ञासु अपना दृष्टिकोण लिए यहां एकत्र हो जाते हैं। तब इस पवित्र धरती पर मन-प्राण में उपजने वाले सूक्ष्मतमम भावों को सशक्त अभिव्यक्ति है यह उपन्यास। इसमें मंत्रमुग्ध करने वाली भारतीय संस्कृति व सनातन धर्म के सभी पहलुओं पर वैज्ञानिक चिंतन है, भारतीय अध्यात्म के विभिन्न पहलुओं को खरेपन के साथ उकेरा गया है। उज्जयिनी अनवरत सांस्कृतिक प्रवाह की साक्षी हे। यह केवल धर्म नहीं, समूची संस्कृति है, जिसमें कलाएं हैं, साहित्य हे, ज्ञान है, विज्ञान है, आस्था है, परंपरा है और भी बहुत कुछ है। यात्रा वृत्तांत शैली के इस उपन्यास में उज्जयिनी के बहाने भारतीय दर्शन, परंपराओं और संस्कृति की खोज हे जो सुदूर विदेशियों को भी आकर्षित करती है। उज्जयिनी के लोक जीवन की झांकी के साथ भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं का सतत आख्यान है जो पुरा मनीषियों की मेधा का महकता प्रतीक हे। उपन्यास के विलक्षण कथा संसार को कुशल लेखिका ने अपनी लेखनी के संस्पर्श से अनन्य बना दिया है। नायक एल्विस के साथ पाठक शिप्रा के प्रवाह में प्रवाहित होता है, डुबकी लगाता है। ‘ भूभल’ जैसे सशक्त उपन्यास से कीर्ति पाने के बाद बहुचर्चित रचनाकार मीनाक्षी स्वामी का नवीनतम उपन्यास “नतोऽहं’ तथाकथित आधुनिकता से आक्रांत भारतीय जनमानस को अपनी जड़ों की ओर आकृष्ट करता है। भारतीय संस्कृति व अध्यात्म की खोज में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए अप्रतिम उपहार है।\u003c\/p\u003e","brand":"मीनाक्षी स्वामी","offers":[{"title":"Default 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तथा मान लेना कि रचना के लिए प्रकृति व पुरुष का मिलन भी जरूरी है । मूल समस्या तो पुरुष की है, उसके पौरुषिक अहम् की, जो उसे ‘बेचारा’ बना देती है । सहज तो इसे ही बनाना है । इसी की असहजता से स्त्री बहुत-से बंधन तोड़कर आगे निकल आई है । लेकिन बंधनहीन होकर किसी उच्छ्रंखल को रचना करना लेखक का अभिप्रेत नहीं है, बल्कि बंधनो की जकड़न को समाप्त कर प्रत्येक सुर को उसका यथोचित स्थान देकर जीवन-राग का निर्माण करना है । अजित के शब्दों में लेखक कहता है : “मैं सुमिता को अपनी दासता से मुक्त कर दूँगा । मैं उसकी दासता से मुक्त हो जाऊँगा। तभी हम सचमुच पति-पत्नी हो सकेंगे।” इसी स्वयं की दासता से मुक्ति का नाम है, ‘अर्द्धनारीश्वर’।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"विष्णु प्रभाकर","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":50130399690919,"sku":null,"price":575.0,"currency_code":"INR","in_stock":false}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/ardh.png?v=1779421674"},{"product_id":"कशमकश-kashmakash-novel-in-hindi","title":"कशमकश  (Kashmakash) Novel in Hindi","description":"\u003cp data-start=\"0\" data-end=\"526\"\u003eबचपन से लेकर जवानी तक संचिता ने अपनी चाहतों को दबाया था... अचानक सपनों का राजकुमार आया तो, मगर हकीकत में उसकी दुनिया को रौंदता चला गया। वो किस हद तक बर्दाश्त करती, विद्रोह कर बैठी... विद्रोह नहीं, अपनी सुरक्षा और बेटी के भविष्य के लिए भाग खड़ी हुई। वो संस्कारों की जंजीरों से बंधी तो है मगर उसमें भी आत्मसम्मान है। वो लड़ना नहीं चाहती थी, न ही जानती थी, लेकिन समय के हाथों मजबूर है। पढ़ी-लिखी व समझदार, आदर्श पत्नी बनने की कोशिश में एक सीमा तक समर्पण को भी तैयार, मगर जब मानव ने उसी लक्ष्मणरेखा को लाँघ दिया तो वो क्या करती...\u003c\/p\u003e\n\u003cp data-start=\"528\" data-end=\"806\"\u003eऔर फिर उसने संघर्ष किया, दुनिया से लड़ी, अपनों को सहा, समाज के नियमों को नारी के पक्ष में किया, सिर्फ इसलिए कि बेटी का जीवन सफल, सुखमय और शीर्ष पर हो... वो और आगे बढ़े... मगर वो इन शब्दों के अर्थों को यथार्थ में परिभाषित नहीं कर पाई... और फिर सब कुछ अपने हाथों में भी तो नहीं...\u003c\/p\u003e\n\u003cp data-start=\"808\" data-end=\"955\"\u003eउसने पति को जिन कारणों से छोड़ा था, बेटी उसी राह पर चलती दिखाई दी... जीवन के हर मोड़ पर उजाले की तलाश में भटकती संचिता के लिए यह अंतिम अँधेरा था...\u003c\/p\u003e\n\u003cp data-start=\"957\" data-end=\"1206\"\u003eबेटी गैसू, आने वाली पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती एक स्वतंत्र युवती, ...सफल है, उसके पास पैसा व नाम है तो उसके अपने आदर्श और अपनी सोच व समझ भी है... उसकी अपनी इच्छाएँ हैं तो फिर भूल भी तो विशिष्ट होंगी... माँ के दर्द को भी अपने नज़रिए से ही देख पाई थी।\u003c\/p\u003e\n\u003cp data-start=\"1208\" data-end=\"1353\" data-is-last-node=\"\" data-is-only-node=\"\"\u003eअंत में प्रगतिशील माँ के आदर्श, बेटी की जीवनशैली से उलझ गए। जीवनभर हर कशमकश का मजबूती से मुकाबला करती संचिता इस अंतर्विरोध को झेल न सकी और तभी...\u003c\/p\u003e","brand":"मनोज सिंह","offers":[{"title":"Default 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