{"title":"इतिहास (History)","description":"","products":[{"product_id":"भारत-के-अतीत-की-खोज-bharat-ke-atit-ki-khoj-history","title":"भारत के अतीत की खोज (Bharat Ke Atit Ki Khoj) History","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eभारत के अतीत की खोज आज का करीब-करीब हर शिक्षित भारतवासी सम्राट अशोक, चंद्रगुप्त, समुद्रगुप्त, कनिष्क तथा बुद्ध जैसे ऐतिहासिक चरित्रों से परिचित है, परंतु जो बात अधिकतर शिक्षाविद् तथा विद्वान् अभी भी नहीं जानते, वह यह है कि करीब 200 वर्ष पहले ये सभी नाम या तो अपरिचित थे या इनके बारे में बहुत कम जानकारी थी। वस्तुतः 18वीं शताब्दी के आते-आते भारत अपने इतिहास को विस्मृति के गर्भ में खो चुका था। एक प्रकार से हम कह सकते हैं कि 18वीं शताब्दी में हमारे पास एक समृद्ध अतीत तो था, परंतु इतिहास नहीं। यह अतीत किस प्रकार हमारे इतिहास में परिवर्तित हुआ, यही इस पुस्तक का मूल विषय है। इस काम को करने वाले महत्त्वपूर्ण अंग्रेज विद्वान् थे--सर विलियम जोन्स, जिन्होंने 1784 में कलकत्ता में एशियाटिक सोसायटी की स्थापना की, जो इन सारे अध्ययनों का केंद्र बनी। इसी के अंतर्गत आधी शताब्दी के दौरान जो काम हुआ, उसके परिणाम-स्वरूप ही हमारा अधिकांश प्राचीन इतिहास प्रकाश में आया। प्रस्तुत पुस्तक में इसी आधी शताब्दी की कहानी है। साथ ही इसमें इस विषय की भी विवेचना है कि ये सभी विद्वान् अपने अध्ययन-कार्यों में मात्रा साम्राज्य- वाद की भावना से प्रेरित थे अथवा नहीं।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"ओम प्रकाश केजरीवाल","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48171062755495,"sku":null,"price":450.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/bharatkeatit_1_4797c10c-e0b3-40c1-8e6f-7059ff6b47d7.png?v=1776155651"},{"product_id":"आर्य-ऋग्वेद-और-भारतीय-सभ्यता-arya-rigved-or-bhartiya-sabhyta","title":"आर्य, ऋग्वेद और भारतीय सभ्यता (Arya, Rigved or Bhartiya Sabhyta)","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eऋग्वेद भारतीय संस्कृति, धर्म और सभ्यता, प्रकारान्तर से कहें तो हिन्दू संस्कृति, धर्म और दर्शन की पीठिका है। भारत आर्यों की मूलभूमि है, इस सत्य को झुठलाने की बहुत कोशिशें होती रही हैं। ‘आर्य, ऋग्वेद और भारतीय सभ्यता’ में ऋग्वेद के हर अंग की विस्तृत मीमांसा की गई है। ऋग्वेद विश्व का प्राचीनतम ग्रन्थ है। प्राचीनतम होते हुए भी इसकी सर्वांगीण पूर्णता और हर दृष्टि से सर्वोत्तमता को देखते हुए ऋग्वेद को अपौरुषेय भी माना जाता रहा है। अपौरुषेय मानने के पीछे धार्मिक कारण भी रहा हो सकता है। जो भी हो पर इसे मानवी मेधा की ही रचना कहना ठीक होगा। प्रस्तुत पुस्तक में ऋग्वेदिक संस्कृति और सभ्यता के नैरन्तर्य को दिखाया गया है। भारतीय समाज के ताने-बाने का जो ढाँचा आज है, वह ऋग्वेद से लेकर सिन्धु-सरस्वती सभ्यता से होता हुआ वर्तमान काल तक आया है। चाहे वह पारिवारिक और सामाजिक जीवन को दर्शाने वाला रूप हो या धार्मिक आस्था और विश्वास की मान्यता हो, या दार्शनिक चिन्तन-मनन की परम्परा हो, उन सभी के मूल में ऋग्वेद ही है। ऋग्वेद आर्यों के महान् और विलक्षण सांस्कृतिक ऋक्थ का प्राचीनतम और सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रन्थ है। वह न केवल हिन्दू दर्शन, धर्म और पारिवारिक, सामाजिक तथा शासकीय व्यवस्था को दर्शाने वाला आदि ग्रन्थ है बल्कि विश्व के प्राचीनतम और उत्कृष्टतम काव्य का गान भी है।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"कृपाशंकर सिंह","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48171134124199,"sku":null,"price":800.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/arya_1.png?v=1774762864"},{"product_id":"पर्वत-गाथा-parvat-gaatha-history","title":"पर्वत गाथा (Parvat Gaatha) History","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eपर्वतों और मनुष्य का रिश्ता आदिकाल से चला आ रहा है। पर्वतों पर उगने वाले वन, उनसे प्राप्त होने वाले खनिज, वनोपज आदि मनुष्य के उपयोग की वस्तुएँ रही हैं। आज भी आदिवासी और गाँवों के लोग वनोपजों से अपनी जीविका अर्जित करते हैं। पर्वतों के जंगलों से लकड़ी मिलती है। पर्वतों से देश की जलवायु अत्यधिक प्रभावित होती है। यदि भारत के उत्तर में हिमालय न होता तो मानसूनी हवाएँ सीधे मध्य तथा उत्तरी एशिया में पहुँचकर पानी बरसातीं और भारत एक रेगिस्तान बन जाता। हिमालय पर्वत सर्दियों में उत्तरी एशिया से आने वाली बेहद ठंडी हवाओं से भी भारत की रक्षा करता है। पर्वत मनुष्य के जीवन में विभिन्न रूपों में जुड़े रहे हैं और उनका महत्त्व आज भी है। ‘महानता’ के अर्थ में ‘पर्वत’ के अलावा कोई दूसरी उपमा नहीं दी जाती। आज मनुष्य ने पर्वतों को काटकर रास्ते बनाने में सफलता पा ली है। जीवन में सफलता की ऊँचाइयों की तुलना पर्वत शिखरों से की गई है। हमारे देश में अनेक गौरवशाली पर्वत हैं और उनके प्रति लोगों में अटूट आस्था है। उन पर्वतों पर लोग पूजा करते हैं, मेले लगते हैं और मन की मुराद पूरी करते हैं। भारत के ऐसे ही पूज्य, गौरवशाली, इतिहास- प्रसिद्ध और धार्मिक आस्था के प्रतीक पर्वतों की गाथा है यह पुस्तक।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"हरिकृष्ण देवसरे","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48272871719079,"sku":null,"price":400.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/parvat.png?v=1774760687"},{"product_id":"अथ-नदी-कथा-ath-nadi-katha","title":"अथ नदी कथा (Ath Nadi Katha) History","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eभारत की नदियों की पवित्रता, ऐतिहासिकता, पौराणिकता और उनके गौरवशाली वरदानों से हम सदियों से जुडे हैं । आम आदमी के लिए, नदी की यह कथा न केवल रोचक हो सकती है, उसके लिए प्रेरक भी हो सकती है। समय के साथ हमने कितनी ही नदियों की गाथाएँ भुला दी हैं। केवल उँगलियों पर गिने जा सकने वाले नाम ही लोगों को याद हैं। इस पुस्तक में यही प्रयास किया गया है कि भारत को लगभग सभी महत्वपूर्ण नदियों को सम्मिलित किया जाए। फिर भी क्षेत्रीय महत्त्व की और छोटे यात्रा-पथ वाली नदियों का छूट जाना स्वाभाविक ही है। इस पुस्तक में सम्मिलित नदियों का यथासंभव पौराणिक महत्व, उनकी पौराणिक एवं लोक-प्रसिद्ध कथाएँ, उनसे संबद्ध ऋषियों, तपस्वियों की कथाएँ दी गई है । इसी के साथ उनकी उत्पत्ति की कथाएँ, उद्गम स्थल का भौगोलिक महत्त्व और फिर आगे के यात्रा-पथ का वर्णन है। यात्रा-पथ में नदी के दोनों तटों पर बसे धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं औद्योगिक नगरों के साथ साथ तीर्थों, संगमों, मंदिरों आदि के लोकव्यापी महत्त्व को भी रेखांकित किया गया है। ये सभी विवरण हमारी भावी पीढ़ी, युवा पीढ़ी और प्रौढ़ों-तीनों के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"हरिकृष्ण देवसरे","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48272893051047,"sku":null,"price":400.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/nadi.png?v=1774761169"},{"product_id":"महायात्रा-गाथा-4-खंड-mahayatra-gatha-4-vols-historical-fiction-bestseller","title":"‘महायात्रा गाथा’ (4 खंड ) \/ Mahayatra Gatha ( 4 Vols.) Historical Fiction, Bestseller","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003e‘महायात्रा गाथा’ मानव इतिहास की उस दीर्घ यात्रा को प्रस्तुत करती है, जिसकी शुरुआत प्रागैतिहासिक काल से मानी जाती है—लगभग 5000 ई.पू. से भी पहले, जब मानव ने प्रकृति के बीच अपना अस्तित्व गढ़ना शुरू किया।\u003c\/span\u003e\u003cbr\u003e\u003cspan\u003eइन्द्र से मांधाता (5500 ई.पू. से 3500 ई.पू.) और मांधाता से जनमेजय (3500 ई.पू. से 1500 ई.पू.) तक की यात्रा मानव सभ्यता के प्रारंभिक विकास, संघर्ष और सामाजिक संरचना को दर्शाती है।\u003c\/span\u003e\u003cbr\u003e\u003cspan\u003eजनमेजय से अजातशत्रु (1500 ई.पू. से 600 ई.पू.) और फिर अजातशत्रु से हर्षवर्धन (600 ई.पू. से 700 ई.) तक आते-आते इतिहास अधिक स्पष्ट और संगठित रूप लेने लगता है।\u003c\/span\u003e\u003cbr\u003e\u003cspan\u003eहर्षवर्धन से पृथ्वीराज चौहान (700 ई. से 1200 ई.) तक का काल भारतीय संस्कृति, राजनीति और युद्धों के उत्कर्ष का प्रतीक है।\u003c\/span\u003e\u003cbr\u003e\u003cspan\u003eयह संपूर्ण यात्रा केवल घटनाओं का वर्णन नहीं, बल्कि मनुष्य के बौद्धिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास का जीवंत चित्रण है।\u003c\/span\u003e\u003cbr\u003e\u003cspan\u003eरांगेय राघव ने इस कृति में इतिहास को केवल तथ्य नहीं, बल्कि एक प्रवाहमान कथा के रूप में प्रस्तुत किया है।\u003c\/span\u003e\u003cbr\u003e\u003cspan\u003eइस प्रकार ‘महायात्रा गाथा’ मानव सभ्यता के उद्भव से लेकर उसके उत्कर्ष तक की कालजयी ऐतिहासिक गाथा बन जाती है।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"रांगेय राघव","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48965398855847,"sku":null,"price":1450.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/maha-1fb.png?v=1777184963"}],"url":"https:\/\/amarsatyaprakashan.com\/collections\/%e0%a4%87%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b8-history.oembed","provider":"अमरसत्य","version":"1.0","type":"link"}