{"title":"आत्मकथा \/ जीवनी (Autobiography \/ Biography)","description":"","products":[{"product_id":"सहचर-है-समय-sahchar-hai-samay-autobiography","title":"सहचर है समय (Sahchar Hai Samay) Autobiography","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eसहचर है समय रामदरश मिश्र का समय को सहचर मानना प्रकारांतर से 'स्व' और 'समय' के संबंधों की द्वंद्वात्मकता और सामंजस्य की ओर संकेत करता है । इस आत्मवृत्त से एक ओर कछार के अंचल में बीते बचपन से लेकर वाराणसी में उच्च शिक्षा, जीविका-संघर्ष, गुजरात-प्रवास, दिल्ली- आगमन, बहुआयामी रचनाशीलता और दिल्ली के साहित्यिक परिवेश से जुड़े मार्मिक प्रसंगों का जुलूस उमड़ पड़ा है, दूसरी ओर इसी के समानांतर स्वतंत्रता-पूर्व का ग्रामीण परिवेश, स्वतंत्रता और जनतांत्रिक आकांक्षाएँ, व्यवस्था के अंतर्विरोध, अध्यापन-जगत की राजनीति, भारत-पाक युद्ध, आपातकाल, इंदिरा गाँधी का निधन, सिख-विरोधी हिंसा यानी कि पचास वर्षों का जीवंत इतिहास अपनी अनेक विशेषताओं और कुरूपताओं के साथ उभरा है ।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"रामदरश मिश्र","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48197082677415,"sku":null,"price":600.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/sachar.png?v=1774424903"},{"product_id":"दोहरा-अभिशाप-dohra-abhishaap-novel-in-hindi","title":"दोहरा अभिशाप (Dohra Abhishaap) Autobiographical Novel in Hindi","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eदलित साहित्य के आम उपन्यासों की तरह बैसंत्री का यह उपन्यास भी आत्मकथात्मक है; लेकिन कई अन्य बातों में यह आम दलित साहित्य के उपन्यासों से भिन्न है । यह उपन्यास लेखिका के लंबे, संघर्षपूर्ण, कड़वे-मीठे अनुभवों से भरे जीवन के एक सिंहावलोकन के रूप में लिखा गया है अत: यह आत्मरति या आत्मपीड़न से उत्प्न्न उन स्तब्धकारी प्रभावों से मुक्त है जो आम तौर पर दलित साहित्य की रचनाओं में पाए जाते हैं । इसमें ऐसे प्रसंग नहीं है कि पाठक क्रोध, घृणा और जुगुप्सा के भावों से भर जाए या दाँतों तले अंगुली दबाकर रह जाए । यह एक सीधी-सादी जीवन-कथा है जो हर प्रकार के साहित्यिक छलों से मुक्त है । घोर-से-घोर परिस्थितियों में भी आदमी अपने लिए एक सुरक्षित नीड़ का निर्माण कर लेता है । इस नीड़ का निर्माण वे प्रेम से कस्ते हैं-बच्चों का प्रेम, माता-पिता का प्रेम, मित्रों और परिवारजनों का प्रेम, अनजान व्यक्तियों का प्रेम और कुल मिलाकर जिंदगी से प्रेम । इस प्रेम के बिना कोई जी नहीं सकता । यह जिंदगी का कारण भी है और उसकी सार्थकता भी । इसलिए यह कहना कि दलितों के जीवन में और होता ही क्या है, इकतरफा और जल्दबाजी का वक्तव्य है ।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"कौसल्या बैसंत्री","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48242598772903,"sku":null,"price":225.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/dohrapb_1.png?v=1774684854"},{"product_id":"मंटो-ज़िंदा-है-manto-zinda-hai-biography","title":"मंटो ज़िंदा है (Manto Zinda Hai) Biography","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eसआदत हसन मंटो उर्दू साहित्य का एक बड़ा लेखक होने के साथ-साथ, भाषाओं और देशों की सीमाओं को लाँघ लेखकों- पाठकों की विश्व बिरादरी का हिस्सा बन चुका है । गोर्की, चेखव और मोपासाँ जैसे कथाकारों के साथ विश्व के कथा-शीर्ष पर खड़ा मंटो एक अद्वितीय कथाकार तो है ही, एक अजब और आजाद शख्सीयत भी है । ऐसे लेखक को 'पाकिस्तानी' या 'हिंदुस्तानी' कठघरों में रखकर नहीं देखा जा सकता । मंटो जैसे कालजयी लेखक की जिन्दगी को 'मंटो जिन्दा है' में जीवंतता, गतिशीलता और संपूर्णता से पकडा गया है । 'मंटो जिन्दा है' ऐसी जीवनकथा है जो वृतांत होते हुए भी, वृतांत को बाहर-भीतर से काटती-तोड़ती पाठकीय चेतना को झकझोरती जाती है । मंटो की जिन्दगी के कई केंद्रीय मोटिफ, प्रतीक और पेटॉफर पाठक को स्पन्दित करने लगते है और यह महसूस करता है जैसे वह मंटो को अपनी परिस्थिति, समय और साहित्य के साथ जीने लगा हो । लेखक ने जैसे मंटो को जिन्दा महसूस किया है, पाठक भी किताब पढ़ते हुए वैसी ही हरारत महसूस करने लगता है । मंटो की जिन्दगी ययां टुकडों में नहीं, संपूर्ण जीवनानुभव और समग्र कला-आनुभव के रूप से आकार लेती गई है और एक कला-फार्म में ढलती गई है । इस चुनौतीपूर्ण कार्य का नरेन्द्र मोहन ने आत्मीयता और दायित्व से ही नहीं, निस्संगता और साहस से पूरा किया है । उपलब्ध स्रोतों की गहरी पश्चात करते हुए लेखक घटनाओँ और प्रसंगों की भीतरी तहों में दाखिल हुआ है और इस प्रकार मंटो के जीवन-आख्यान और कथा-पिथक को बडी कलात्मकता से डी-कोड किया है । वृतांत और प्रयोग के निराले संयोजन में बँधी यह मंटो- कथा मंटो को उसके विविध रंगों और छवियों के साथ उसके प्रशंसकों-पाठकों के रू-ब-रू खडा कर देती है ।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"नरेन्द्र मोहन","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48243370754215,"sku":null,"price":300.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/manto.png?v=1774591486"},{"product_id":"नायक-बनाम-प्रतिनायक-nayak-banam-pratinayak-biography","title":"नायक बनाम प्रतिनायक (Nayak Banam Pratinayak) Biography","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eप्रस्तुत पुस्तक का लक्ष्य सावरकर के संघर्षमय जीवन के कुछ मुद्दों पर सायास उत्पन्न किए गए विवाद के घटाटोप से उन्हें मुक्तकर, राष्ट्रीय जीवन में उनके तात्विक योगदान के समग्र और वस्तुपरक आकलन का एक विनम्र प्रयास है। राजनीति-प्रेरित क्षुद्रीकरण के सुनियोजित अभियान से जो भ्रम उत्पन्न किया गया है, उचित परिप्रेक्ष्य में तथ्यपरक परीक्षण और वस्तुगत विमर्श द्वारा उसके समाहार का निष्ठावान उपक्रम। वास्तविकता यह है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्य धारा के स्ऽलन से एक भयावह रिक्ति उत्पन्न हुई थी जिसके पीछे कांग्रेस-नेतृत्व के हवाई आदर्शवाद एवं ऐतिहासिक यथार्थ की समझ का दुर्भाग्यपूर्ण अभाव था। सावरकर ने उस रिक्ति को भरने का ऐतिहासिक दायित्व निभाया। उस रिक्ति के कई जटिल कारण थे जो कांग्रेस और मुस्लिम लीग के उद्भव और विकास की परस्पर विरोधी ऐतिहासिक धाराओं में अनुस्यूत थे। सावरकर के नेतृत्व में हिंदू महासभा को इस भूमिका के निर्वाह में लीग के साथ-साथ कांग्रेस से भी द्वंद्व का सामना करना पड़ा। किंतु इस प्रक्रिया में सावरकर-नीत महासभा के सक्रिय होने में काफी विलंब हो चुका था। लिहाजा, आजादी के साथ रक्तरंजित विभाजन को रोका नहीं जा सका, जिसने इस उपमहाद्वीप के भविष्य को दीर्घ- कालीन अशांति और हिंसा के भँवर में डाल दिया। प्रस्तुत पुस्तक इस त्रसदी के उत्स के खुलासे का एक विनम्र प्रयास भी है।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"कमलाकांत त्रिपाठी","offers":[{"title":"Default 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साहेब अम्बेदकर की प्रतिभा और उनके जीवन पर्यंत के अथक प्रयसों को दिया जा सकता है। डाॅ. अम्बेदकर के अंतिम वर्ष एक ओर उनके जीवन केअत्यंत निर्णायक वर्ष थे, दूसरी ओर उनके गिरते हुए स्वास्थ्य और उनके चारों ओर की संदेहात्मक स्थितियों की छाया भी उन वर्षों पर छाई हुई थी। इसलिए यह पुस्तक डाॅ. अम्बेदकर के जीवन का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गई है।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"नानकचंद रत्तू","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48245412429991,"sku":null,"price":500.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/ambedkar.png?v=1774601249"},{"product_id":"रसीदी-टिकट-rasidi-ticket-autobiography","title":"रसीदी टिकट (Rasidi Ticket) Autobiography of Amrita Pritam","description":"\u003cdiv\u003e\n\u003cspan class=\"gmail-T286Pc\"\u003eमशहूर लेखिका \u003c\/span\u003e\u003cspan class=\"gmail-T286Pc\"\u003eअमृता प्रीतम की\u003c\/span\u003e\u003cspan\u003e आत्मकथा। \u003c\/span\u003e\n\u003c\/div\u003e\n\u003cdiv\u003e\u003cspan\u003eयह पुस्तक प्रेम, जुदाई, विभाजन की त्रासदी और एक लेखक के रूप में उनके अनुभवों को बयां करती है\u003c\/span\u003e\u003c\/div\u003e\n\u003cdiv\u003e\u003cspan\u003eअमृता प्रीतम ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि लोग उन्हें एक 'रसीदी टिकट' जितना छोटा समझते थे, जिसे किसी कागज़ पर चिपकाकर कहीं भी भेजा जा सकता है।\u003c\/span\u003e\u003c\/div\u003e\n\u003cdiv\u003e\n\u003cspan\u003eयह एक निर्भीक और स्पष्टवादी लेखन है, जिसमें उन्होंने अपने जीवन की अनचाही सच्चाई को भी सामने रखा है। \u003c\/span\u003e\u003cspan\u003eइसमें उनके निजी रिश्तों और सृजन की प्रक्रिया को बहुत खूबसूरती से पेश किया गया है।\u003c\/span\u003e\n\u003c\/div\u003e","brand":"अमृता प्रीतम","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48273761632423,"sku":null,"price":245.0,"currency_code":"INR","in_stock":false}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/rasidi.png?v=1774767306"},{"product_id":"ख़ानाबदोश-khanbadosh-autobiography","title":"ख़ानाबदोश (Khanbadosh) Autobiography","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eदर्द ही जिंदगी का आखिरी सच है। दर्द और अकेलापन। और आप न दर्द साझा कर सकते हैं, न अकेलापन। अपना-अपना दर्द और अपना-अपना अकेलापन हमें अकेले ही भोगना होता है। फर्क सिर्फ इतना, कि अपनी सलीब जब अपने कंधों पर उठाकर हम जिंदगी की गलियों में से गुज़रे, तो हम रो रहे थे या मुस्करा रहे थे, कि हम अपने ज़ख्मी कंधों पर उठाए अपनी मौत के ऐलान के साथ, लोगों की भी डों से तरस माँग रहे थे, कि उस हालत में भी उन्हें एक शहंशाह की तरह मेहर और करम के तोहफे बाँट रहे थे। दर्द और अकेलापन अगर अकेले ही जाना होता है, तो फिर यह दास्तान आपको क्यों सुना रही हूँ ? मैं तो जख्मी बाज़ की तरह एक बहुत पुराने, नंगे दरख्त की सबसे ऊपर की टहनी पर बैठी थी—अपने जख्मों से शर्मसार, हमेशा उन्हें छुपाने की कोशिश करती हुई। सुनसान अकेलेपन और भयानक खामोशी से घबराकर यह दास्तान कब कहने लग पड़ी ? यसु मसीह तो नहीं हूँ दोस्तों, उनकी तरह आखिरी सफर में भी एक नज़र से लोगों की तकलीफों को पोंछकर सेहत का, रहम का दान नहीं दे सकती।  पर लगता है, अपनी दास्तान इस तरह कहना एक छोटा-सा मसीही करिश्मा है जरूर ! नहीं ? पर अब जब इन लिखे हुए लफ्जों को फिर से पढ़ती हुँ तो लगता है, वीरान बेकिनार रेगिस्तान में मैंने जैसे जबरन लफ्जों की यह नागफनी बोई है।पर हर नागफनी के आसपास बेशुमार खुश्क रेत है तो तप रही है, बेलफ़्ज खामोश।-अजीत कौर\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"अजीत कौर","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48304818978983,"sku":null,"price":300.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/khanabadosh.png?v=1775103199"},{"product_id":"कूड़ा-कबाड़ा-kuda-kabada-autobiography","title":"कूड़ा-कबाड़ा (Kuda-Kabada) Autobiography","description":"\u003cp data-start=\"0\" data-end=\"221\"\u003e\u003cstrong data-start=\"0\" data-end=\"18\"\u003e“कूड़ा कबाड़ा”\u003c\/strong\u003e साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित पंजाबी लेखिका \u003cspan class=\"hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline\"\u003e\u003cspan class=\"whitespace-normal\"\u003eअजीत कौर\u003c\/span\u003e\u003c\/span\u003e की एक प्रसिद्ध आत्मकथात्मक पुस्तक है। इसे उनकी पहले की आत्मकथा \u003cstrong data-start=\"170\" data-end=\"184\" data-is-only-node=\"\"\u003e“खानाबदोश”\u003c\/strong\u003e का अगला भाग (सीक्वल) माना जाता है।\u003c\/p\u003e\n\u003cp data-start=\"223\" data-end=\"507\"\u003eइस पुस्तक में अजीत कौर ने अपने जीवन के बेहद दर्दनाक और संघर्षपूर्ण अनुभवों को साझा किया है। उन्होंने घरेलू हिंसा से जूझते हुए अपने जीवन की कहानी बताई है। आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के बावजूद, उन्होंने एक घुटन भरी ज़िंदगी जी, जिसमें अपमान, नफ़रत और मानसिक-शारीरिक यातनाएँ शामिल थीं।\u003c\/p\u003e\n\u003cp data-start=\"509\" data-end=\"671\" data-is-last-node=\"\" data-is-only-node=\"\"\u003eयह पुस्तक उस कड़वे सच को उजागर करती है कि एक सशक्त दिखने वाली महिला भी निजी जीवन में कितनी पीड़ा सह सकती है, यहाँ तक कि उसे अपने ही घर से बाहर निकाल दिया जाता है।\u003c\/p\u003e","brand":"अजीत कौर","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48304847650983,"sku":null,"price":325.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/koorah.png?v=1775103723"},{"product_id":"निज-पथ-का-अविचल-पंथी-nij-path-ka-avichal-panchi","title":"निज पथ का अविचल पंथी (Nij Path Ka Avichal Panchi)","description":"\u003cp\u003e\u003cem\u003e\u003cspan\u003e जब ‘आत्मकथा’ लिखनी शुरू की थी तो सोचता था वे सारे प्रसंग कैसे लिखूं। बहुत से बड़े-बड़े नेताओं को अच्छा नहीं लगेगा। परंतु अब निर्णय किया है कि मैंने सक्रिय राजनीति छोड़ दी। राजनीति में भी अब मेरी उपस्थिति नाममात्र की होगी। कुछ मित्रों से मैंने कहा भी था, मैं अब ‘गैस्ट आर्टिस्ट’ की तरह रहूंगा एक ‘अतिथि सदस्य’ के रूप में। पहले मैं राजनेता था, इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नियंत्रित रखनी पड़ती थी। अब मैं पहले एक लेखक हूं उसके बाद कुछ और। इसलिए लेखक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मेरा अधिकार है। मैंने ‘आत्मकथा’ लिखने में उसका पूरा उपयोग किया है और बहुत कुछ अनकहा भी अब कह दिया है। मैंने पूरा जीवन जी लिया। जी भर जिया, पूरे आनंद से जिया। जीवन जिया भी और उसकी पूरी कहानी और अनुभव आज विस्तार से लिख भी दिया। जीवन का शेष विवेकानंद सेवा केंद्र में प्रभु को अर्पण करूंगा। अब उस घड़ी की प्रतीक्षा करूंगा, जब मुझे इस बार का दायित्व निभाकर वहां जाना है जहां से मैं आया था। सच कहता हूं हंसता-मुस्कराता गीत गाता हुआ जाऊंगा। -शान्ता कुमार\u003c\/span\u003e\u003c\/em\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"शान्ता कुमार","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48304880812199,"sku":null,"price":500.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/niz.png?v=1775104198"},{"product_id":"सरला-एक-विधवा-की-आत्मजीवनी-sarala-ek-vidhva-ki-aatmjivani-autobiography","title":"सरला : एक विधवा की आत्मजीवनी (Sarala : Ek Vidhva Ki Aatmjivani) Autobiography","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eसरला: एक विधवा की आत्मजीवनी हिंदी में किसी स्त्री के द्वारा आत्मकथा लिखने का पहला प्रयास है इसलिए ऐतिहासिक भी है। यह अपने आप में आश्चर्यजनक है कि वर्ष 1915-1916 के बाद इस क्षेत्र में एक लंबा अंतराल दिखाई देता है। इस आत्मजीवनी के पाठ के संदर्भ में यह जिक्र करना भी आवश्यक लगता है कि यह इक्कीसवीं सदी की किसी नारीवादी महिला की आत्माकथा नहीं है बल्कि एक सामान्य स्त्री की आपबीती है। तत्कालीन समय और समाज में यह बात ही अपने आप में नई है कि कोई विधवा स्त्री अपनी और अपने जैसों की पीड़ा के बारे में सोचती है, न सिर्फ सोचती है बल्कि लिखकर उस पीड़ा को समाज के सामने उजागर करने का साहस करती है। इस आत्मजीवनी में लेखिका के निजी जीवन से जुड़े वह हिस्से हैं जो जीवन के एक खंड की कथा के रूप में तत्कालीन सामाजिक परिदृश्य में स्त्रियों से जुड़ी अनेक सामाजिक समस्याओं को उभारकर सामने ले आते हैं। -प्रज्ञा पाठक\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"प्रज्ञा पाठक","offers":[{"title":"Default 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समेटे हुए है। यहां निंदर के होने मात्र से सामान्य से ब्यौरों में धार और द्वंद्वात्मकता आ गई है। नरेन्द्र मोहन के साथ निंदर यहां एक केंद्रीय मेटॉफर का दर्जा प्राप्त करता गया है जो जितना दिलकश है उतना अर्थपूर्ण भी । नरेन्द्र मोहन ने सयानेपन और चौकन्नेपन से परे रहते हुए अपने हाथों अपना चित्रण यहां बेहद ईमानदारी से किया है जिसे पाठक इस किताब के रेशे- रेशे में महसूस कर सकते हैं। घटनाओं और हादसों की अहमियत हर आत्मकथा में रहती है। मगर 'कमबख़्त निंदर' में इनका अपना ही रंग है। आगे-पीछे के प्रसंगों के संयोजन में यहां गहरी जिज्ञासा, आकर्षण और नाटकीयता है। इनकी चुभन और खलिश, आह्लाद और आनंद के नुकीले-चमकीले बिंबों ने जब लेखकीय मन को घेरा है तो समां बंध गया है, घटनाएं और हादसे और के और हो गए हैं। यह इस आत्मकथा की ऐसी विशेषता है जो इसे भारतीय भाषाओं में लिखी गई आत्मकथाओं में अलग खड़ा कर देती है। सभी के लिए निश्चय ही पढ़ने लायक एक बेहतरीन आत्मकथा ।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"नरेन्द्र मोहन","offers":[{"title":"Default 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सृजन-यात्रा से हिंदी साहित्य को अब तक 11 उपन्यास, 12 कहानी-संग्रह, 5 यात्रा संस्मरण, 6 निबंध-संग्रह, 1 कविता-संग्रह के अतिरिक्त बाल कथाएं, समसामयिक विषयों पर निबंध, आलोचनात्मक लेख आदि विविध लेखन की संपदा प्राप्त हुई है। इस यात्रा के मील स्तंभ हैं-'लाल पीली जमीन', 'हुजूर दरबार', 'पांच आंगनों वाला घर', 'कोहरे में कैद रंग', 'धीर समीरे', 'अरण्य-तंत्र' जैसे बहुचर्चित उपन्यास और 'रंगों की गंध' जैसे समग्र यात्रा-वृत्त संकलन। गोविन्द मिश्र व्यास सम्मान, साहित्य अकादेमी (केंद्रीय) पुरस्कार और भारत भारती जैसे बड़े सम्मानों से नवाजे जा चुके हैं।उनकी कालजयी कृतियां उनकी जीवन यात्रा का प्रतिफल हैं। उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में प्राइमरी स्कूल के अध्यापक परिवार में जन्मा-पला यह व्यक्ति कैसे केंद्रीय सरकार के सर्वोच्च पद तक पहुंचा-यह अपने आप में एक कहानी है, बचपन में ही उसमें सृजनात्मकता के बीज कैसे पड़े, वह साहित्य की ओर कैसे मुड़ा यह दूसरी कहानी है। इनमें निहित संघर्ष-गाथा जीवनी का उपयुक्त कथा पटल प्रस्तुत करती है।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"उर्मिला शिरीष","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48316905423015,"sku":null,"price":300.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/bahar.png?v=1775201709"},{"product_id":"एक-थी-सारा-ek-thi-saara-biography","title":"एक थी सारा (Ek Thi Saara) Biography","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eअमृता प्रीतम द्वारा लिखित \u003c\/span\u003e\u003cspan\u003e '\u003c\/span\u003e\u003cspan\u003eएक थी सारा' \u003c\/span\u003e\u003cspan\u003eएक मार्मिक संस्मरण\/जीवनी पुस्तक है, जो पाकिस्तानी उर्दू कवयित्री सारा शगुफ़्ता\u003c\/span\u003e\u003cspan\u003e के दुखद जीवन पर आधारित है। अमृता प्रीतम ने इसमें सारा के संघर्षों, मानसिक यंत्रणा, असफल विवाहों और अंततः ट्रेन के आगे कूदकर आत्महत्या करने (4 जून 1984) की कहानी को बहुत करीब से बयां किया है, जिसमें सारा के पत्र भी शामिल हैं।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"अमृता प्रीतम","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48332434145447,"sku":null,"price":200.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/sara_015fcec9-1fe2-4671-837d-f5b06ed5b1cd.png?v=1775378039"},{"product_id":"युगदृष्टा-शिवाजी-yugdrishta-shivaji-historical-novel-biography","title":"युगदृष्टा शिवाजी (Yugdrishta Shivaji) Historical Novel, Biography","description":"\u003cp\u003e\u003cspan\u003eराष्ट्रकवि ने खूब कहा है— ‘राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है। कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है।।’ महापुरुषों की हार्दिकता से गायी गई गाथा सदैव आनंददायी है। मध्ययुग में रूढि़वादिता और धर्मांधता के छाए घने अंधेरे के बीच शिवाजी ने मानव स्वतंत्रता का जो दीप जलाया था, वह आज भी प्रज्वलित है। हमें धीरज बंधता है कि देर है, अंधेर नहीं। सुहानी सुबह उजाला लाएगी और हम तन-मन से, बंधनमुक्त होंगे। आधुनिक युग को लें। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने उद्घोष किया था—‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।’ उन्होंने शिवाजी जयंती पर बृहत् आयोजन किया, जिसकी अध्यक्षता करते हुए स्वामी विवेकानंद ने शिवाजी को, उचित ही, देश का महानायक कहा था। यह उपन्यास शिवाजी के प्रेरक व्यक्तित्व और कृतित्व की गाथा कहता है। कथा इतिहास पर आधरित है, इसे बयान करने में उपन्यासकार की कल्पना की उतनी ही भूमिका है, जितनी शुद्ध सोने में लगे टांके की, जो उसे गहने में ढालती है। उपन्यास पढ़ देखिए। रोचक कथा। गतिमय शैली।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"शशिभूषण सिंहल","offers":[{"title":"Default Title","offer_id":48392365736103,"sku":null,"price":250.0,"currency_code":"INR","in_stock":true}],"thumbnail_url":"\/\/cdn.shopify.com\/s\/files\/1\/0745\/2131\/3447\/files\/shivaji.png?v=1775968948"},{"product_id":"भित्ति-bhitti-autobiography","title":"भित्ति (Bhitti) Autobiography","description":"\u003cp\u003e\u003cspan class=\"T286Pc\" data-sfc-cp=\"\" data-sfc-root=\"c\" data-sfc-cb=\"\" data-processed=\"true\"\u003e\u003cspan\u003eएस० एल० भैरप्पा की आत्मकथा। \u003c\/span\u003e\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e\n\u003cdiv\u003e\u003cspan\u003eपेशे से प्राध्यापक होते हुए भी, प्रवृत्ति से साहित्यकार बने रहने वाले भैरप्पा ऐसी गरीबी से उभरकर आए हैं जिसकी कल्पना तक कर पाना कठिन है। इनका जीवन सचमुच ही संघर्ष का जीवन रहा। हुब्बल्लि के काडसिद्धेश्वर कॉलेज में अध्यापक की हैसियत से कैरियर शुरू करके इन्होने आगे चलकर गुजरात के सरदार पटेल विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के एन-सी-ई-आर-टी- तथा मैसूर के प्रादेशिक शिक्षा कॉलेज में सेवा की । \u003c\/span\u003e\u003c\/div\u003e\n\u003cp\u003e\u003cspan class=\"T286Pc\" data-sfc-cp=\"\" data-sfc-root=\"c\" data-sfc-cb=\"\" data-processed=\"true\"\u003eयह पुस्तक उनके लेखक बनने के सफर और भारतीय साहित्य में योगदान को दर्शाती है। \u003c\/span\u003e\u003cspan class=\"T286Pc\" data-sfc-cp=\"\" data-sfc-root=\"c\" data-sfc-cb=\"\" data-processed=\"true\"\u003eयह डॉ. भैराप्पा द्वारा जीवन में अपनाई गई नैतिक और व्यक्तिगत मूल्यों का विस्तृत विवरण है।\u003c\/span\u003e\u003c\/p\u003e","brand":"एस० एल० भैरप्पा","offers":[{"title":"Default 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